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चहुँ सागर मद कौन मिटाए

डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’
बेंगलुरु (कर्नाटक)

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सहनशीलता धीरज सीमा,
आर्त्त दीनता कौन मानते
दया धर्म अरु क्षमा भाव मन,
असुर प्रकृति कब कहाँ जानते।

परपीड़ा आह्लाद सफलता,
सक्षम जो सामर्थ्य दिखाए
दीन-हीन चीत्कार सुहावन,
मानवता खल कहाँ सुहाए।

लखि अवसादित दर्प चमकता,
त्राहिमाम स्वर कहाँ सुहाए
पद अहंकार अधिकार मगन,
जनमन रोदन क्यों कर भाए।

स्वाभिमान आम अब राम कहाँ,
संधान बाण कौन दहाड़े
अब दीन हीन सब हैं याचक,
चहुँ सागर मद कौन मिटाए।

बड़वानल जल रहे आज सब,
रक्षक भक्षक जब बन जाते
कहँ आश्रय साफल्य आश मन,
कहँ दास भाव मन जा पाते।

क्षत-विक्षत धन मान मनोबल,
श्रमिक व्यंग्य सामर्थ्य उड़ाते
जला पंख सम कीट पतंगों,
नीरव निराश्रित-सा बन जाते।

कहाँ नाद अनुनाद जख़्म गम,
कहाँ पहुँच जन आहें भरते
व्यर्थ सकल श्रंगार चारु तनु,
निष्ठुर सजना विरह दिलाते।

साहस धैर्य मनोबल संयम,
मति विवेक तब साथ छुड़ाए
बने प्रशासक दानवीय खल,
अत्याचार मुदित मन भाए।

दबे बोझ परिपालन अपने,
पीड़ित भाव न कभी निकाले
कौन सहारा बने निर्वहण,
क्रान्ति दूत क्या अलख जगाए।

बड़ी बेबसी गाथा जनता,
शिक्षा-भिक्षा रूप बनाए
कहाँ दर्द स्नेहिल करुणा दिल,
क्रूर प्रशासन रूह जगाए।

निर्माणक जब आहत चाहत,
राहत अरुणिम कौन बनाए।
गहन तिमिर छा जड़ा वयस अब,
कौन काल कवलित हो जाए।

कहाँ एकता स्वार्थ हृदय तल,
सत्ता पद सुख आश जगाए
छोड़ हाथ मँझधार साथ जो,
एकाकी क्या पार लगाए।

पुनः अभिमन्यु समर अकेला,
घिरे महारथ कौन बचाए
मिले सभी सत्ता सुख आगम,
भूल ज़ख़्म गम मौन सुहाए।

कहँ दिनकर सम उषा किरण सुख,
चाह प्रगति चहुँ राह दिखाए।
जला तपिश आक्रान्तक शासक,
निशिकांत सुखद ज्योति मुस्काए॥

परिचय-डॉ.राम कुमार झा का साहित्यिक उपनाम ‘निकुंज’ है। १४ जुलाई १९६६ को दरभंगा में जन्मे डॉ. झा का वर्तमान निवास बेंगलुरु (कर्नाटक)में,जबकि स्थाई पता-दिल्ली स्थित एन.सी.आर.(गाज़ियाबाद)है। हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी,मैथिली,बंगला, नेपाली,असमिया,भोजपुरी एवं डोगरी आदि भाषाओं का ज्ञान रखने वाले श्री झा का संबंध शहर लोनी(गाजि़याबाद उत्तर प्रदेश)से है। शिक्षा एम.ए.(हिन्दी, संस्कृत,इतिहास),बी.एड.,एल.एल.बी., पीएच-डी. और जे.आर.एफ. है। आपका कार्यक्षेत्र-वरिष्ठ अध्यापक (मल्लेश्वरम्,बेंगलूरु) का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप हिंंदी भाषा के प्रसार-प्रचार में ५० से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़कर सक्रिय हैं। लेखन विधा-मुक्तक,छन्दबद्ध काव्य,कथा,गीत,लेख ,ग़ज़ल और समालोचना है। प्रकाशन में डॉ.झा के खाते में काव्य संग्रह,दोहा मुक्तावली,कराहती संवेदनाएँ(शीघ्र ही)प्रस्तावित हैं,तो संस्कृत में महाभारते अंतर्राष्ट्रीय-सम्बन्धः कूटनीतिश्च(समालोचनात्मक ग्रन्थ) एवं सूक्ति-नवनीतम् भी आने वाली है। विभिन्न अखबारों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हैं। विशेष उपलब्धि-साहित्यिक संस्था का व्यवस्थापक सदस्य,मानद कवि से अलंकृत और एक संस्था का पूर्व महासचिव होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी साहित्य का विशेषकर अहिन्दी भाषा भाषियों में लेखन माध्यम से प्रचार-प्रसार सह सेवा करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ है। प्रेरणा पुंज- वैयाकरण झा(सह कवि स्व.पं. शिवशंकर झा)और डॉ.भगवतीचरण मिश्र है। आपकी विशेषज्ञता दोहा लेखन,मुक्तक काव्य और समालोचन सह रंगकर्मी की है। देश और हिन्दी भाषा के प्रति आपके विचार(दोहा)-
स्वभाषा सम्मान बढ़े,देश-भक्ति अभिमान।
जिसने दी है जिंदगी,बढ़ा शान दूँ जान॥ 
ऋण चुका मैं धन्य बनूँ,जो दी भाषा ज्ञान।
हिन्दी मेरी रूह है,जो भारत पहचान॥

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