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चीन में हिंदी के प्रचार-प्रसार को लेकर हुई अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी

शांगहाई(चीन)।

चीन में हिंदी के प्रचार-प्रसार को लेकर शनिवार को शांगहाई में अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी की गई। इस दौरान चीन में हिंदी शिक्षण,अनुवाद और संचार माध्यमों में हिंदी के विकास,संभावनाओं और चुनौतियों पर विचार-विमर्श किया गया। इसमें हिंदी के क्षेत्र में काम करने वाले विशेषज्ञों और प्रतिनिधियों सहित कई प्रतिभागियों ने शिरकत की।

उदघाटन समारोह की अध्यक्षता भारतीय कौंसुल जनरल अनिल कुमार राय ने की। उन्होंने कहा कि पिछले एक दशक में हिंदी शिक्षण का दायरा बढ़ रहा है। इसके साथ ही चीन में भी भारतीय भाषाओं का विस्तार हो रहा है। इस तरह की कोशिश जारी रहे तो एक-दूसरे को समझने में आसानी होगी। पेकिंग विश्वविद्यालय के प्रो.च्यांग चिंगख्वेई ने अपने अंदाज में कहा कि हिंदी उनका जीवन है। वे इससे प्रेम करते हैं। उन्होंने कहा कि चीन में हिंदी को ७७ साल हो गए। हालांकि,चीन में सबसे प्राचीन विदेशी भाषा के तौर पर संस्कृत को जाना जाता है। वैज्ञानिक तकनीकी शब्दावली आयोग के अध्यक्ष व निदेशक प्रो. अवनीश कुमार ने कहा कि हिंदी भारत की संपर्क भाषा व्यवहारिक रूप से बन चुकी है। भारत के साथ संपर्क रखने वाली विदेशी सरकारें भी हिंदी की आवश्यकता महसूस करने लगी हैं।

राष्ट्रपति भवन के विशेष कार्याधिकारी डॉ.राकेश दुबे ने जोर देकर हिंदी और प्राचीन भारतीय भाषा और संस्कृति के महत्व को समझाया। उन्होंने कहा कि,अंग्रेजी हिंदी सहित अन्य क्षेत्रीय भाषाओं का नुकसान कर रही हैं।

कार्यक्रम संचालक प्रो.नवीन चंद्र लोहनी ने कहा कि इस संगोष्ठी के माध्यम भारत,चीन को जोड़ने की कोशिश की गई है। इसमें सभी प्रतिभागियों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया,यह अपने तरह की पहली संगोष्ठी है,जिसमें मीडिया,प्राथमिक शिक्षा,विश्वविद्यालय शिक्षा,अनुवाद,तकनीक,राजभाषा हिंदी के प्रयोग सहित तमाम अहम मुद्दों पर विमर्श किया गया।

माइक्रोसॉफ्ट इंडिया के प्रो.बालेंदु शर्मा ने बताया कि तकनीक के क्षेत्र में हिंदी का कितने सुलभ ढंग से इस्तेमाल किया जा रहा है। उदघाटन सत्र के बाद हिंदी और अनुवाद से जुड़ी पुस्तक प्रदर्शनी का लोकार्पण भी किया गया। इसके बाद हिंदी शिक्षण-स्कूल से विश्वविद्यालय तक हिंदी,अनुवाद और संचार माध्यमों में हिंदी व हिंदी लेखन-शिक्षण की चुनौतियां और संभावनाएं विषय पर तीन तकनीकी सत्र आयोजित किए गए। समापन सत्र का संचालन पल्लवी गोरे ने किया। इस दौरान डॉ.राजीव रंजन,आशीष गोरे,अमित देशमुख,किरण वालिया,अनिल पांडेय,आशीष भट्नागर,शैली त्यागी चांग यू थोंग. रान पिन. तंग पिंग,राजेश पुरोहित, किरण वालिया, रीना गुप्ता आदि ने भी विचार रखे।

(सौजन्य:वैश्विक हिंदी सम्मेलन,मुंबई)