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चुनाव के बाद संभावनाएं क्या-क्या ?

डॉ.वेदप्रताप वैदिक
गुड़गांव (दिल्ली) 
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इस १७ वें आम चुनाव के बाद किसकी सरकार बनेगी, उसका स्वरुप क्या होगा,और देश की राजनीति की दिशा क्या होगी,ये सवाल लोगों के दिमाग में अभी से उठने लगे हैं। मतदान का सातवां दौर १९ मई को खत्म होगा, लेकिन विभिन्न पार्टियों के नेताओं ने जोड़-तोड़ की राजनीति अभी से शुरु कर दी है। यह तो सभी को पता है कि २०१९ का वक्त २०१४ की तरह नहीं है। इस बार न तो कोई लहर है,न कोई नारा है। मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए नेता लोग अपनी पार्टी या गठबंधन के बहुमत का दावा जरुर कर रहे हैं लेकिन उन्हें पता है कि अबकी बार ऊंट किसी भी करवट बैठ सकता है। मुझे कम से कम पांच प्रकार की संभावनाएं दिखाई पड़ रही हैं। पहली संभावना यदि हम यही मानकर चलें कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह का दावा सही निकलेगा याने भाजपा को कम से कम ३०० सीटें मिलेंगी तो भी इस नई सरकार के साथ देश की कई छोटी-मोटी पार्टियां गठबंधन करना चाहेंगी। जाहिर है कि स्पष्ट बहुमत और गठबंधन की यह सरकार काफी मजबूत और स्थायी होगी। उसका नेतृत्व भी नरेंद्र मोदी और अमित शाह ही करेंगे। इस नई सरकार के नेता तो पुराने ही होंगे,लेकिन उनकी नीतियां नई होंगी। इस बार नोटबंदी-जैसे तुगलकी काम नहीं होंगे। विदेश नीति में हर कदम फूंक-फूंककर रखा जाएगा। नेतृत्व अपनी सर्वज्ञता के भुलावे से बचेगा और विशेषज्ञों की राय लेकर नई लकीरें खींचेगा। देश की अर्थनीति, शिक्षा नीति,और स्वास्थ्य नीति में देश के नेता की भूमिका प्रचार मंत्री की नहीं,प्रधानमंत्री की होगी। याने कुछ ठोस काम किए जाएंगे। इससे उल्टा भी हो सकता है। प्रचंड बहुमत की सरकार नेताओं के दिमाग को फुला सकती है,जैसा कि १९७१ में इंदिराजी की जबर्दस्त विजय के बाद हुआ था। इंदिरा ही इंडिया है,यह नारा चल पड़ा था। ऐसी स्थिति में देश में कोहराम मचे बिना नहीं रहेगा। भारत में अराजकता और हिंसा का एक नया दौर शुरु हो सकता है। दूसरी संभावना यह है कि भाजपा को २०० से कम सीटें मिलें। ऐसी स्थिति में गठबंधन सरकार खड़ी करने में भाजपा को ज्यादा मुश्किल नहीं होगी,क्योंकि वह तब भी सबसे बड़ी पार्टी होगी। राष्ट्रपति सबसे पहले उसे ही सरकार बनाने का मौका देंगे। वह सबसे अधिक साधन सम्पन्न पार्टी है। सांसदों को अपनी तरफ मिलाने के लिए उसके पास सत्ता और पत्ता,दोनों ही है। हाँ,भाजपा को विचार करना पड़ सकता है कि उसका नया नेता कौन हो। गठबंधन में आनेवाली पार्टियां और भाजपा के वरिष्ठ नेता भी चाहेंगे कि उनका नया नेता थोड़ा विनम्र हो, विचारशील हो और दूरंदेशी हो। भाजपा में ऐसे कई नेता हैं,जिन्हें संघ और भाजपा के अलावा विरोधी दलों में भी पसंद किया जाता है। तीसरी संभावना यह है कि कांग्रेस पार्टी को १०० के आस-पास या कुछ ज्यादा सीटें मिल जाएं। ऐसी स्थिति में कांग्रेस सरकार बनाने का दावा पेश करेगी और राष्ट्रपति से कहेगी कि भाजपा से कम सीटें उसे जरुर मिली हैं लेकिन क्योंकि भाजपा को जनता ने नकार दिया है, इसलिए उस बासी कढ़ी को फिर चूल्हे पर चढ़ाने की बजाय कांग्रेस को सरकार बनाने का मौका दिया जाए। यह राष्ट्रपति के स्वविवेक पर निर्भर होगा कि कांग्रेस को मौका दिया जाए या नहीं। यदि कांग्रेस को मौका मिलता है तो जाहिर है कि उसके पास इस समय प्रधानमंत्री का कोई योग्य उम्मीदवार नहीं है। यदि वह राहुल गांधी को आगे बढ़ाएगी तो प्रांतीय पार्टियों के उम्रदराज नेताओं को यह प्रस्ताव पचेगा नहीं। वैसे कांग्रेस में प्रधानमंत्री के लायक कई नेता हैं। यदि कांग्रेस के समर्थन से किसी अन्य पार्टी के नेता ने सरकार बना ली तो उसकी दशा चौधरी चरणसिंह और ह.डो.देवगौड़ा की सरकारों की तरह काफी नाजुक बनी रहेगी। विपक्ष की यह सरकार चाहे कांग्रेस के नेतृत्व में बने या किसी अन्य पार्टी के नेतृत्व में, उसमें जबर्दस्त खींचतान चलती रहेगी और वह अल्पजीवी ही होगी। चौथी संभावना वह है,जिस पर तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव काम कर रहे हैं याने नई सरकार ऐसी बने, जो भाजपा और कांग्रेस से मुक्त हो। याने जैसे देवेगौड़ा और गुजराल की अल्पजीवी सरकारें थीं। ऐसी सरकारें आप जोड़-तोड़कर खड़ी तों कर सकते हैं,लेकिन आज वैसी संभावना बिल्कुल नहीं दिखाई पड़ती। यह तभी संभव है जबकि भाजपा और कांग्रेस,इन दोनों पार्टियों को कुल मिलाकर दो-ढाई सौ सीटें मिलें। गैर-भाजपाई और गैर-कांग्रेसी दलों को जब तक ३०० या उससे ज्यादा सीटें नहीं मिलें,वे सरकार कैसे बना पाएंगे ? उन सभी प्रांतीय दलों के नेताओं के अहंकार को संतुष्ट करना आसान नहीं है,और वे अनेक वैचारिक,जातिय और व्यक्तिगत अन्तर्विरोधों से ग्रस्त रहते हैं। पांचवीं संभावना एक सपने की तरह है। वह यह कि जब किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिले और जनाभिमत टुकड़े-टुकड़े होकर कई पार्टियों में बंट जाए तो सभी पार्टियां मिलकर एक राष्ट्रीय सरकार क्यों नहीं बना लें ? परस्पर विरोधी पार्टियों ने मिलकर यूरोप और भारत के कई प्रांतों में भी ऐसी सरकारें बनाई हैं या नहीं ? वैसी ही सरकार केंद्र में भी क्यों नहीं बनाई जा सकती ? ऐसी सरकार के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा नेताओं का व्यक्तिगत अहंकार तो है ही,उससे भी ज्यादा वर्तमान लोकसभा-चुनाव में उनके बीच चला अशिष्ट और अश्लील वाग्युद्ध है। अब किस मुँह से वे एक ही जाजम पर बैठ सकते हैं ? यह ठीक है कि अब सिद्धांत और विचारधारा का युग बीत चुका है। अब सत्ता ही ब्रह्म है,बाकी सब माया है। इस सत्य के बावजूद सर्वदलीय सरकार बनना असंभव-सा ही है। यह संभावना मेरे नक्शे में तो है ही नहीं कि २३ मई के बाद भारत में कोई सरकार बन ही नहीं पाएगी और राष्ट्रपति को फिर नए चुनाव का आदेश जारी करना पड़ेगा। ऐसी स्थिति में हम अगले पांच साल की भारतीय राजनीति को किस दिशा में बढ़ते हुए देख रहे हैं ? जाहिर है कि उक्त पांचों विकल्प हमें निश्चिंतता प्रदान नहीं कर रहे हैं। अगले पांच साल भारतीय लोकतंत्र के लिए अपूर्व लाभकारी भी हो सकते हैं और आपातकाल की तरह या उससे भी ज्यादा खतरनाक भी सिद्ध हो सकते हैं। जो भी हो,इस नाजुक वक्त में जो बात सबसे ज्यादा दिलासा दिलाती है,वह है जनता की जागरुकता। भारत में लोकतंत्र की जड़ें इतनी गहरी हो चुकी हैं कि सरकारों की अस्थिरता और नेताओं के दिग्भ्रम के बावजूद वे हरी ही रहेंगी।

परिचय-डाॅ.वेदप्रताप वैदिक की गणना उन राष्ट्रीय अग्रदूतों में होती है,जिन्होंने हिंदी को मौलिक चिंतन की भाषा बनाया और भारतीय भाषाओं को उनका उचित स्थान दिलवाने के लिए सतत संघर्ष और त्याग किया। पत्रकारिता सहित राजनीतिक चिंतन, अंतरराष्ट्रीय राजनीति और हिंदी के लिए अपूर्व संघर्ष आदि अनेक क्षेत्रों में एकसाथ मूर्धन्यता प्रदर्शित करने वाले डाॅ.वैदिक का जन्म ३० दिसम्बर १९४४ को इंदौर में हुआ। आप रुसी, फारसी, जर्मन और संस्कृत भाषा के जानकार हैं। अपनी पीएच.डी. के शोध कार्य के दौरान कई विदेशी विश्वविद्यालयों में अध्ययन और शोध किया। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त करके आप भारत के ऐसे पहले विद्वान हैं, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय राजनीति का शोध-ग्रंथ हिन्दी में लिखा है। इस पर उनका निष्कासन हुआ तो डाॅ. राममनोहर लोहिया,मधु लिमये,आचार्य कृपालानी,इंदिरा गांधी,गुरू गोलवलकर,दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी सहित डाॅ. हरिवंशराय बच्चन जैसे कई नामी लोगों ने आपका डटकर समर्थन किया। सभी दलों के समर्थन से तब पहली बार उच्च शोध के लिए भारतीय भाषाओं के द्वार खुले। श्री वैदिक ने अपनी पहली जेल-यात्रा सिर्फ १३ वर्ष की आयु में हिंदी सत्याग्रही के तौर पर १९५७ में पटियाला जेल में की। कई भारतीय और विदेशी प्रधानमंत्रियों के व्यक्तिगत मित्र और अनौपचारिक सलाहकार डॉ.वैदिक लगभग ८० देशों की कूटनीतिक और अकादमिक यात्राएं कर चुके हैं। बड़ी उपलब्धि यह भी है कि १९९९ में संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत का प्रतिनिधित्व किया है। आप पिछले ६० वर्ष में हजारों लेख लिख और भाषण दे चुके हैं। लगभग १० वर्ष तक समाचार समिति के संस्थापक-संपादक और उसके पहले अखबार के संपादक भी रहे हैं। फिलहाल दिल्ली तथा प्रदेशों और विदेशों के लगभग २०० समाचार पत्रों में भारतीय राजनीति और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर आपके लेख निरन्तर प्रकाशित होते हैं। आपको छात्र-काल में वक्तृत्व के अनेक अखिल भारतीय पुरस्कार मिले हैं तो भारतीय और विदेशी विश्वविद्यालयों में विशेष व्याख्यान दिए एवं अनेक अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलनों में भारत का प्रतिनिधित्व किया है। आपकी प्रमुख पुस्तकें- ‘अफगानिस्तान में सोवियत-अमेरिकी प्रतिस्पर्धा’, ‘अंग्रेजी हटाओ:क्यों और कैसे ?’, ‘हिन्दी पत्रकारिता-विविध आयाम’,‘भारतीय विदेश नीतिः नए दिशा संकेत’,‘एथनिक क्राइसिस इन श्रीलंका:इंडियाज आॅप्शन्स’,‘हिन्दी का संपूर्ण समाचार-पत्र कैसा हो ?’ और ‘वर्तमान भारत’ आदि हैं। आप अनेक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों और सम्मानों से विभूषित हैं,जिसमें विश्व हिन्दी सम्मान (२००३),महात्मा गांधी सम्मान (२००८),दिनकर शिखर सम्मान,पुरुषोत्तम टंडन स्वर्ण पदक, गोविंद वल्लभ पंत पुरस्कार,हिन्दी अकादमी सम्मान सहित लोहिया सम्मान आदि हैं। गतिविधि के तहत डॉ.वैदिक अनेक न्यास, संस्थाओं और संगठनों में सक्रिय हैं तो भारतीय भाषा सम्मेलन एवं भारतीय विदेश नीति परिषद से भी जुड़े हुए हैं। पेशे से आपकी वृत्ति-सम्पादकीय निदेशक (भारतीय भाषाओं का महापोर्टल) तथा लगभग दर्जनभर प्रमुख अखबारों के लिए नियमित स्तंभ-लेखन की है। आपकी शिक्षा बी.ए.,एम.ए. (राजनीति शास्त्र),संस्कृत (सातवलेकर परीक्षा), रूसी और फारसी भाषा है। पिछले ३० वर्षों में अनेक भारतीय एवं विदेशी विश्वविद्यालयों में अन्तरराष्ट्रीय राजनीति एवं पत्रकारिता पर अध्यापन कार्यक्रम चलाते रहे हैं। भारत सरकार की अनेक सलाहकार समितियों के सदस्य,अंतरराष्ट्रीय राजनीति के विशेषज्ञ और हिंदी को विश्व भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने के लिए कृतसंकल्पित डॉ.वैदिक का निवास दिल्ली स्थित गुड़गांव में है।