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जड़ें, जोड़े रखती हैं हमें

अजय जैन ‘विकल्प’
इंदौर (मध्यप्रदेश)
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मनुष्य का सबसे पहला संसार उसका परिवार होता है। यहीं से वह बोलना और चलना ही नहीं, जीना भी सीखता है। परिवार केवल खून का रिश्ता नहीं है, यह नैतिकता की पहली प्रयोगशाला है, जहाँ प्रेम बीज की तरह बोया जाता है और विश्वास वटवृक्ष की तरह पनपता है। आज जब समाज तेजी से बदल रहा है, रिश्ते सिमट रहे हैं और व्यक्ति अकेला होता जा रहा है, दूसरों से कट रहा है, तब इन मूल्यों की ओर लौटना सबसे बड़ी आवश्यकता बन गई है।
     सभी को मालूम है कि बच्चा विद्यालय बाद में जाता है, पहले वह घर के आँगन में सीखता है। दादी की कहानी में उसे सच की जीत का बोध होता है, पिता की मेहनत में उसे कर्तव्य दिखता है और माँ के आँचल में उसे नि:स्वार्थ प्रेम मिलता है। नैतिकता कोई किताबी सिद्धांत नहीं है। यह तब जन्म लेती है, जब भाई अपने हिस्से की मिठाई बहन को दे देता है, जब बेटा बूढ़े पिता के पास बैठकर उनका हाल पूछता है, जब बहू अपनी सास को माँ जैसा सम्मान देती है। ये छोटी-छोटी घटनाएँ ही चरित्र और व्यवहार का निर्माण करती हैं एवं जीवनभर साथ रहती हैं। आज परिवार सिमट रहे हैं, एकल होते जा रहे हैं। ऐसे में सबके सामने बड़ी चुनौती है, और इसके लिए हमें अपने घरों में संवाद यानी बातचीत को जीवित रखना होगा। इसके लिए साथ बैठकर भोजन करना, बुजुर्गों को समय देना, बच्चों को धैर्य से सुनना जरूरी है। यही वह सहयोग है, जो परिवार को टूटने से बचाता है। वास्तव में जो घर प्रेम से जुड़ा होता है, वह संकट में चट्टान बन जाता है। आज के समय में तकनीक ने हमारी दूरियाँ तो कम की हैं, पर दिलों की दूरी बढ़ा दी है। एक ही छत के नीचे 4 लोग 4 स्क्रीन में खोए हैं, हमें इसी मौन को तोड़ना होगा। सबमें बातचीत बनानी होगी।
  ऐसे ही जीवन में प्रेम केवल भावना नहीं, एक दायित्व है। सच्चा प्रेम वही है जो स्वतंत्रता देता है, बाँधता नहीं। पति-पत्नी का प्रेम, भाई-बहन का स्नेह, माता-पिता की ममता, इन सबका आधार एक ही है और वह है विश्वास। विश्वास शब्दों से नहीं, व्यवहार से बनता है। जहाँ प्रेम सच्चा होता है, वहाँ भरोसा सबके आचरण में दिखता है। एक वादा निभाना, कठिन समय में साथ खड़े रहना एवं पीठ पीछे किसी की बुराई न करना, यही विश्वास की ईंटें हैं। हमेशा याद रखिए कि विश्वास टूटने में एक पल लगता है, पर बनने में वर्षों लगते हैं। इसलिए वाणी में मिठास यानी मधुरता, कर्म में पारदर्शिता और मन में निष्कपटता बहुत आवश्यक है। नैतिकता हमें सिखाती है कि प्रेम में स्वार्थ न हो, बस अपनापन हो। जब हम किसी से प्रेम करते हैं तो उसके सुख में अपना सुख देखते हैं। ईर्ष्या, तुलना और अहंकार प्रेम के शत्रु हैं। जहाँ ये आ जाते हैं, वहाँ विश्वास डगमगाने लगता है। हमें समझना और सीखना होगा, कि क्षमा करना प्रेम को बड़ा करता है। गलती हर इंसान से होती है, पर उसे सुधारने का अवसर देना ही हर परिवार को बचाता है।
  परिवार की परिधि से निकलकर जब यही प्रेम और विश्वास समाज में फैलता है, तो वह सहयोग बन जाता है। सहयोग का अर्थ है, दूसरे के दु:ख को अपना समझना। पड़ोसी की बीमारी में साथ जाना, गाँव में किसी की बेटी की शादी में हाथ बँटाना, मुसीबत में बिना कहे मदद के लिए खड़े हो जाना, यही मानवता बनाम इंसानियत भारतीय संस्कृति की आत्मा है। आज प्रतिस्पर्धा के युग में हम ‘मैं’ से आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं, जबकि आवश्यकता साथ मतलब ‘हम’ की है, इसलिए हमें ‘हम’ को पुनः स्थापित करना होगा। साथ का अर्थ केवल भीड़ नहीं है, एक-दूसरे के प्रति उत्तरदायित्व है। नैतिक व्यक्ति वही है, जो अकेले आगे न बढ़कर सबको साथ लेकर चले। कार्यालय हो या मोहल्ला, जहाँ सहयोग होता है, वहाँ तनाव अर्थात समस्या कम होती है और आनंद बढ़ता है, सबमें उत्साह बना रहता है।
  अंततः परिवार, नैतिकता, प्रेम, विश्वास, सहयोग और साथ अलग-अलग शब्द नहीं हैं, ये एक ही माला के मोती हैं। अगर परिवार जड़ है, तो नैतिकता तना है, प्रेम फूल है तो सहयोग उसका फल है। यदि हम अपनी जड़ों को सींचेंगे, तो परिवार-समाज-देश का वृक्ष हरा-भरा रहेगा। इसलिए, निःसंकोच अपने घर से शुरुआत करें, प्रेम बाँटें, विश्वास निभाएँ और साथ चलें। यही सच्ची मानवता है और यही आने वाली पीढ़ियों के लिए हमारी सबसे बड़ी विरासत होगी।