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जो देखा वह लिखा, जिसमें सामाजिक विषयों की जीती-जागती तस्वीर

इन्दौर (मप्र)।

आशा पूर्णा जी ने अपने जीवन के ८६ वर्ष लेखन में व्यतीत किए। उन्होंने जो देखा वह लिखा, जिसमें तात्कालीन, पारिवारिक, सामाजिक विषयों की जीती-जागती तस्वीर मिलती है। पन्द्रह वर्ष की आयु में विवाह हुआ, इसके पश्चात भी जीवन पर्यन्त कलम चलाती रहीं।
मुख्य वक्ता के रूप में पत्रकारिता अध्ययनशाला (देवी अहिल्या विवि) की विभागाध्यक्ष डाॅ. सोनाली नरगुंदे ने यह विचार श्री मध्यभारत हिन्दी साहित्य समिति के सभागार में व्यक्त किए। अवसर रहा ‘सरस्वती की स्टेनो’ के नाम से साहित्य जगत में विख्यात डाॅ. आशा पूर्णा के साहित्यिक कृतित्व एवं व्यक्तित्व पर श्री मध्यभारत हिन्दी साहित्य समिति द्वारा कालजयी साहित्यकार स्मरण की सोलहवीं कड़ी में चर्चा का। आशा पूर्णा जी के साहित्यिक कृतित्व पर त्रिपुरारीलाल शर्मा ने कहा कि २२५ से अधिक कृतियों की रचयिता आशा पूर्णा जी यथार्थ का चित्रण करने में पारंगत साहित्यकार हैं। डाॅ. आरती दुबे ने इनको स्त्री विमर्श, नारी दर्द आदि विषयों पर लिखने वाली महान साहित्यकार बताया। वरिष्ठ साहित्यकार सूर्यकांत नागर ने कहा कि, आशा पूर्णा जी ने बंगला और हिन्दी साहित्य को समृद्ध किया। स्त्री मनोविज्ञान पर आधारित उनकी अधिकांश नायिकाएं विद्रोही रहीं। वक्ता के रूप में डाॅ. बूला कार (आशा जी के साहित्य पर गहन अध्ययन कर २ ग्रंथ लिखे) ने कहा कि भुवनमोहिनी स्वर्ण पदक से सम्मानित उनका सम्पूर्ण साहित्य प्रमुखता के क्षेत्र में आता है। शांति निकेतन में रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने उन्हें सम्पूर्णा की उपाधि दी थी। विलक्षण प्रतिभा की धनी आशा पूर्णा के संदर्भ में सुनने हेतु डाॅ. सुरेन्द्र सक्सेना, प्रचार मंत्री हरेराम वाजपेयी, अनिल भोजे, सम्पादक राकेश शर्मा, मुकेश तिवारी, डाॅ. पुष्पेन्द्र दुबे,
डाॅ. अखिलेश राव और डाॅ. श्रीमती सक्सेना आदि काफी संख्या में साहित्यकार और सुधीजन उपस्थित रहे। संचालन साहित्य एवं संस्कृति मंत्री डाॅ. पद्मा सिंह ने किया। आभार समिति के प्रधानमंत्री अरविंद जवलेकर ने व्यक्त किया।

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