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तीसरी पीढ़ी

डॉ.अनुज प्रभात
अररिया ( बिहार )
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“सुना तुमने, जुगेसर की माँ मर गई..फिर आयेगा मांगने..अब तक तो बीसों बार ले गया। लौटाया एक बार भी नहीं। लिख कर रखा भी है या नहीं, कितने रुपए हुए ?” वर्मा जी की पत्नी क्रोध से तमतमाते स्वर में बोली।
सच भी था, जुगेसर को जब कहीं से कोई जुगाड़ नहीं होता, तब वर्मा जी के पास चला आता। कभी बच्चे की बीमारी को लेकर…तो कभी अपने को खाँसता हुआ दिखाकर…।

हर बार वर्मा जी उसे कुछ न कुछ दे देते और एक पहर तक पत्नी का क्रोध झेलते। इसलिए, आज उनकी धर्मपत्नी जी को जैसे पता लगा कि, जुगेसर की माँ मर गई है, पहले से ही सतर्क करने लगी। फिर उसने एक हिदायत भी दे डाली-“उछलकर वहां मत चले जाना, तुम्हारी तो आदत है…कहीं कुछ हुआ दौड़ गए… चुपचाप घर में रहो…जब कोई आएगा, तब देखा जाएगा।”
अभी उनकी बातें खत्म भी नहीं हुई थी कि, जुगेसर का बेटा मानव आ गया। बोला-” चाचा जी, दादी गुजर गई है.. पिता जी नहीं आएंगे। मुझे पता है…बार-बार कर्ज लेकर उन्होंने चुकता नहीं किया, लेकिन मैं दादी की तीसरी पीढ़ी हूँ। तीन पीढ़ी के ऋण का बोझ चौथी पीढ़ी पर नहीं डालूंगा। दादी ने एक बार कहा था-“दादा जी की जान आपके पिता जी ने बचाई थी।”
वर्मा जी अवाक थे, बालक सब जान रहा था। अभी वे कुछ सोच ही रहे थे कि, धर्मपत्नी जी ने कुछ रूपए लाकर उस बच्चे के हाथ में दे दिए और कहा,- “चिंता मत करो जो भी दिक्कत हो बोलना। बेटा हम तुम्हारे साथ हैं।”

वर्मा जी ने देखा, उसकी आँखों में आँसू हैं। शायद नारी के कोमल हृदय ने तीसरी पीढ़ी को समझ लिया था।

परिचय-एम.ए. (समाज शास्त्र), बी.टी.टी. शिक्षित और साहित्यालंकार सहित विद्यावाचस्पति व विद्यासागर (मानद उपाधि) से अलंकृत राम कुमार सिंह साहित्यिक नाम डॉ. अनुज प्रभात से जाने जाते हैं। १ अप्रैल १९५४ को अंचल नरपतगंज (अररिया, बिहार) में जन्मे व वर्तमान में अररिया स्थित फारबिसगंज में रहते हैं। आपको हिंदी, अंग्रेजी, मैथिली सहित संस्कृत व भोजपुरी का भी भाषा ज्ञान है। बिहार वासी डॉ. प्रभात सेवानिवृत्त (शिक्षा विभाग, बिहार सरकार) होकर सामाजिक गतिविधि में फणीश्वरनाथ रेणु समृति पुंज (संगठन) के संस्थापक सचिव और अन्य संस्थाओं से भी जुड़े हुए हैं। स्क्रीन राइटर एसोसिएशन (मुम्बई) के सदस्य राम कुमार सिंह की लेखन विधा-कहानी, कविता, गज़ल, आलेख, संस्मरण है तो पुस्तक समीक्षा एवं पटकथा लेखक भी हैं। आपके साहित्यिक खाते में प्रकाशित पुस्तकों में ‘बूढ़ी आँखों का दर्द’ (कहानी संग्रह), ‘नीलपाखी’ (कहानी संग्रह), ‘आधे-अधूरे स्वप्न’, ‘किसी गाँव में कितनी बार…कब तक ? (कविता संग्रह) सहित ‘समय का चक्र’ (लघुकथा संग्रह) दर्ज है तो मराठी में अनुवाद (बूढ़ी आँखों का दर्द)भी हुआ है। ऐसे ही कुछ पुस्तकें प्रकाशनाधीन हैं। अनेक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन हो चुका है तो दलित साहित्य अकादमी (दिल्ली) से बाबा साहब भीमराव आम्बेडकर नेशनल फेलोशिप (२००८), रेणु सम्मान (बिहार सरकार), साहित्य प्रभा विद्याभूषण सम्मान
(देहरादून) और साहित्य श्री (छग), साहित्य सिंधु (भोपाल) आदि सम्मान प्राप्त हुए हैं। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी साहित्य व हिन्दी भाषा के प्रति भारतीय युवाओं को जागरूक करना है। आपके पसंदीदा हिन्दी लेखक फणीश्वरनाथ रेणु, बाबा नागार्जुन, मुंशी प्रेमचंद, हिमांशु जोशी और प्रेम जनमेजय हैं। माता-पिता को प्रेरणा पुंज मानने वाले डॉ. अनुज प्रभात का जीवन लक्ष्य साहित्य व मानव सेवा है। देश और हिन्दी भाषा के प्रति विचार-“देश के प्रति हम सभी समर्पित होते हैं, किन्तु देश के विकास के लिए भाषा का विकास आवश्यक है। हमारी राष्ट्र भाषा हिन्दी है और हम उसके प्रति न संवेदनशील हैं और न ही जागरूक। आज निःशुल्क टोल नम्बर पर भी यही बोला जाता है-‘अंग्रेजी के लिए १ दबाएं, हिन्दी के लिए २ दबाएं…।’ हिन्दी के लिए १ दबाएं क्यों नहीं ? बात छोटी है…, पर हमें ध्यान देना चाहिए।”

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