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तुम्हें पाने की आस

सारिका त्रिपाठी
लखनऊ(उत्तरप्रदेश)
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तुम हो
मेरा वो क्षितिज,
जो दूर होकर भी
मुझसे कहता…मेरा है।

तुम
मानो ठहरे हो,
इस उम्मीद में
कि यूँ ही रोज चलते-चलते,
मैं पहुँच सकूँ किसी रोज
तुम तक,
और पा सकूँ तुम्हें
अपने पास,अपने साथ
फिर भर उठूँ मैं तुम्हें
अपने दामन में,
जैसे भर उठते हैं
अंधेरे रौशनी से।

मैं
चलती भी हूँ रोज,
तुम्हें पाने की आस लिए
होके बदहवास-सी,
सच मानो
थकती भी हूँ
गिरती भी हूँ,
संभलती भी हूँ
चोट खाती भी हूँ,
पर रुकती नहीं एक पल को
चलती ही जाती हूँ रोज,
क्रमश: ….क्रमश: …और क्रमश:
पर तुम भी होते जाते हो
मुझसे दूर…और दूर…बहुत दूर।

पर देखो,कैसे
मेरे मन की
कल्पनाओं के तार,
रोज खींच लाते है तुम्हें
मेरे पास…और पास…बहुत पास।

हर सांझ के साथ
तन्हाईयों की चादरें ओढ़,
बिछ जाती हूँ मैं
इन..सागर की लहरों की भाँति,
और शांत किसी कोने में
उतर आते हो चुपके से
तुम भी,बनके ज्वार मेरा,
और दे जाते हो
गत्यात्मकता मुझे जीवन की।

और फिर,
तेरे छुअन से मिलती है मुझको
मेरी ऊर्जा,
नव ऊर्जा…जीवन प्रवाह
और फिर नए सवेरे के साथ,
चल देती हूँ मैं
ये सोचकर,
कि मेरा क्षितिज
ठहरा है
बस उस पार,
जहाँ पहुँचना है मुझको
अबकी सांझ॥

परिचय-सारिका त्रिपाठी का निवास उत्तर प्रदेश राज्य के नवाबी शहर लखनऊ में है। यही स्थाई निवास है। इनकी शिक्षा रसायन शास्त्र में स्नातक है। जन्मतिथि १९ नवम्बर और जन्म स्थान-धनबाद है। आपका कार्यक्षेत्र- रेडियो जॉकी का है। यह पटकथा लिखती हैं तो रेडियो जॉकी का दायित्व भी निभा रही हैं। सामाजिक गतिविधि के तहत आप झुग्गी बस्ती में बच्चों को पढ़ाती हैं। आपके लेखों का प्रकाशन अखबार में हुआ है। लेखनी का उद्देश्य- हिन्दी भाषा अच्छी लगना और भावनाओं को शब्दों का रूप देना अच्छा लगता है। कलम से सामाजिक बदलाव लाना भी आपकी कोशिश है। भाषा ज्ञान में हिन्दी,अंग्रेजी, बंगला और भोजपुरी है। सारिका जी की रुचि-संगीत एवं रचनाएँ लिखना है।