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देश का सपूत

शंकरलाल जांगिड़ ‘शंकर दादाजी’
रावतसर(राजस्थान) 
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वीरों की धरती है भारत जिस पर मैंने जन्म लिया,
माँ की लाज बचाऊँगा जिसकी छाती से दूध पियाl

मेरे रहते बुरी नजर से माँ को देख न पायेगा,
ये दुःसाहस जीवनभर को उसको अंध बनायेगाl

भारत माँ का भाल हमेशा ऊँचा रहता आया है,
पैदा नहीं हुआ है कोई जिसने इसे झुकाया हैl

कुछ गद्दारों की वजह से कई बार ये टूटा है,
मुगलों,अंग्रेजों ने इसको जी भर-भर के लूटा हैl

फिर भी ये अखण्ड भारत है कोई तोड़ न पाया है,
हमने उन आतताइयों को जूते मार भगाया हैl

जबसे ये आजाद हुआ इस पर अधिकार हमारा है,
जन-जन के दिल में बसता ये हिंदुस्तान हमारा हैl

लोकतंत्र का शासन है कोई भी मंत्र नहीं चलता,
जिसको भी हम चुन लेते हैं,वही यहाँ शासक बनताl

आज विश्व सारे में डंका बजता हिन्दुस्तान का,
चर्चा जहाँ कहीं भी हो होता भारत के मान काl

दुनिया का हर कोई देश भारत से दोस्ती चाहता है,
एक बुलावे पर भारत में दौड़ा चला आता हैl

पर ये पाकिस्तान हमेशा लड़ने को उकसाता है,
बैठा सीमा पार से ये हरदम गोले बरसाता हैl

कितना भी समझाओ लेकिन नहीं मानने वाला ये,
बातों का है भूत ये हमसे जूते खाने वाला येl

इतनी बार मार खाकर भी फिर आगे बढ़ आता है,
खून-खराबा करने को ये आतंकी भिजवाता हैl

नहीं सोचता है शेरों के धक्के जब चढ़ जाएगा,
कौन है ऐसा दुनिया में जो इसे बचाने आयेगाl

छोड़ पाक ये हठधर्मी तू मिट्टी में मिल जाएगा,
भारत से टकराने वाला सीधा दोज़ख जाएगाll

परिचय-शंकरलाल जांगिड़ का लेखन क्षेत्र में उपनाम-शंकर दादाजी है। आपकी जन्मतिथि-२६ फरवरी १९४३ एवं जन्म स्थान-फतेहपुर शेखावटी (सीकर,राजस्थान) है। वर्तमान में रावतसर (जिला हनुमानगढ़)में बसेरा है,जो स्थाई पता है। आपकी शिक्षा सिद्धांत सरोज,सिद्धांत रत्न,संस्कृत प्रवेशिका(जिसमें १० वीं का पाठ्यक्रम था)है। शंकर दादाजी की २ किताबों में १०-१५ रचनाएँ छपी हैं। इनका कार्यक्षेत्र कलकत्ता में नौकरी थी,अब सेवानिवृत्त हैं। श्री जांगिड़ की लेखन विधा कविता, गीत, ग़ज़ल,छंद,दोहे आदि है। आपकी लेखनी का उद्देश्य-लेखन का शौक है।