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पारंपरिक त्योहार या पर्यावरण से खिलवाड़

शीला बड़ोदिया ‘शीलू’
इंदौर (मध्यप्रदेश )
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दीपावली को दीपों की जगमगाहट, खुशी, प्रेम और रंग-बिरंगी सुंदर-सुंदर मिठाईयों के मनाया जाता है। इस त्योहार के पहले ही अपने घरों की साफ-सफाई की जाती है। घर के दरवाजे पर महालक्ष्मी और अतिथियों के स्वागत के लिए सुंदर, आकर्षक रंगोली बनाते हैं। अपने परिवार, पड़ोसियों और रिश्तेदारों को मिठाई एवं उपहार देकर खुशियाँ मनाते हैं। दीपावली का मूल संदेश अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ना है, लेकिन आज त्योहार मनाने के कुछ तरीकों के कारण पर्यावरण प्रदूषण की समस्या बढ़ रही है।
    दशहरे से दीपावली तक पर बड़ी मात्रा में पटाखे, फुलझड़ी, अनार, रॉकेट आदि आधुनिक तरीके के प्रकाश और उत्पन्न करने वाले पटाखे जलाए जाते हैं। इनसे निकलने वाला धुआँ और हानिकारक कण वायु को प्रदूषित करते हैं। इससे साँस लेने में परेशानी होती है। बच्चों, बुजुर्गों और साँस संबंधी बीमारियों से पीड़ित लोगों को विशेष कठिनाई होती है। इन पटाखों से निकलने वाला धुआँ वातावरण की गुणवत्ता को भी खराब करता है। प्राचीन समय में ऐसे आवाज और प्रदूषण फैलाने वालों पटाखे-फुलझड़ी का उपयोग नहीं होता था। ऐसे में आज पटाखों और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली सामग्री की जगह मिट्टी के दीपक जलाकर पर्यावरण को सुरक्षित किया जा सकता है।
     तेज आवाज वाले पटाखों से ध्वनि प्रदूषण बढ़ता है। इससे बच्चों, बुजुर्गों और बीमार व्यक्तियों को परेशानी होती है। तेज आवाज से पशु-पक्षी, गाय-भैंस, बकरी, कुत्ते, बिल्ली, चिड़िया भी डरकर घबरा जाते हैं और उनकी सामान्य गतिविधियाँ प्रभावित होती हैं।
      त्योहार पर हमारे घरों में अनेक प्रकार के पकवान और मिठाइयाँ बनती हैं। कई बार आवश्यकता से अधिक भोजन बनाया जाता है, जिससे बहुत-सा खाना बर्बाद हो जाता है। मैदा, वनस्पति घी, अधिक शक्कर वाले और रासायनिक रंगों का खाने के लिए उपयोग स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक है। इसलिए, आवश्यकता के अनुसार ही मिठाइयाँ और पकवान बनाएँ।
बचे हुए अच्छे भोजन को सुरक्षित तरीके से जरूरतमंद लोगों तक पहुँचाएँ।
  त्योहार पर मिठाइयों, उपहारों और सजावटी वस्तुओं को पैक करने के लिए प्लास्टिक, थर्माकोल और अन्य पैकेजिंग सामग्री का उपयोग किया जाता है। इनसे निकलने वाला कचरा भी पर्यावरण को नुकसान पहुँचाता है। प्लास्टिक का अनुचित निपटान मिट्टी और जल को भी प्रदूषित कर सकता है।
ऐसे ही बिजली की अत्यधिक खपत होती है। घरों, दुकानों और बाजारों में सजावट के लिए कई-कई दिनों तक अनावश्यक लाइटें जलाई जाती हैं। इससे बिजली की खपत बढ़ती है। बिजली उत्पादन के लिए जीवाश्म ईंधनों का उपयोग होने पर, ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन भी बढ़ सकता है। ऐसे में घरों में सजावट के लिए ऊर्जा की कम खपत करने वाली एलइडी लाइटों का उपयोग सही है।
  पारंपरिक आयोजन के बाद फूलों, प्लास्टिक की झालरों, सजावटी वस्तुओं और अन्य सामग्री का कचरा इकट्ठा हो जाता है। यदि इसे उचित तरीके से अलग करके निपटाया न जाए, तो यह आसपास की स्वच्छता और पर्यावरण को प्रभावित करता है। प्लास्टिक की जगह कपड़े, कागज या पुनः उपयोग की जा सकने वाली सामग्री अपनाना पर्यावरण के हित में है।
   त्योहारों पर आवश्यकता से अधिक भोजन बनाना, भोजन को फेंक देना और एक बार इस्तेमाल होने वाले बर्तनों का अत्यधिक उपयोग करना पर्यावरण पर अतिरिक्त दबाव डालता है। भोजन की बर्बादी से लैंडफिल में जैविक कचरा बढ़ता है और उसके सड़ने से मीथेन जैसी ग्रीनहाउस गैस निकल सकती है।
   धार्मिक आयोजन पर दिखावे और अनावश्यक खर्च की बजाय प्रेम, सहयोग और खुशियाँ बाँटें, क्योंकि दीपावली केवल घरों को रोशन करने का त्योहार नहीं है, बल्कि यह विचारों और व्यवहार में भी प्रकाश लाने का अवसर है। यदि हम अपने घरों को हजारों रोशनी से सजाएँ, लेकिन अपने आसपास धुआँ, शोर और कचरा फैलाएँ, तो हमें अपने त्योहार मनाने के तरीकों पर विचार करना चाहिए। यानी खुशियाँ तो मनाई जा सके, लेकिन प्रकृति को भी नुकसान पहुंचाए बिना, तभी तो यह पर्व उत्साह और उमंग का होगा।
  यह रोशनी का त्योहार है, प्रदूषण फैलाने का नहीं। इसलिए हमें अपनी परंपराओं का सम्मान करते हुए ऐसे तरीके अपनाने होंगे, जिनसे पर्यावरण सुरक्षित रहे। पटाखों के स्थान पर दीपक जलाना, भोजन की बर्बादी रोकना, प्लास्टिक का उपयोग कम करना और ऊर्जा बचाना हमारी छोटी-छोटी लेकिन महत्वपूर्ण पहल हैं,जिससे पर्यावरण को सहेजा जा सकेगा।

परिचय-शीला बड़ोदिया का साहित्यिक उपनाम ‘शीलू’ और निवास इंदौर (मप्र) में है। संसार में १ सितम्बर को आई शीला बड़ोदिया का जन्म स्थान इंदौर ही है। वर्तमान में स्थाई रूप से खंडवा रोड पर ही बसी हुई शीलू को हिन्दी, अंग्रेजी व संस्कृत भाषा का  ज्ञान है, जबकि बी.एस-सी., एम.ए., डी.एड. और बी.एड. शिक्षित हैं।  शिक्षक के रूप में कार्यरत होकर आप सामाजिक गतिविधि में बालिका  शिक्षा, नशा मुक्ति, बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ, बेटी को समझाओ अभियान, पेड़ बचाओ अभियान एवं रोजगार उन्मुख कार्यक्रम में सक्रिय हैं। इनकी लेखन विधा-कविता, कहानी, लघुकथा, लेख, संस्मरण, गीत और जीवनी है। प्रकाशन के रूप में काव्य संग्रह (मेरी इक्यावन  कविता) तथा १५ साझा संकलन में रचनाएँ हैं। कई पत्र-पत्रिकाओं में आपकी लेखनी को स्थान मिला है। इनको मिले सम्मान व पुरस्कार में गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड सम्मान (साझा संकलन), विश्व संवाद केंद्र मालवा (मध्य प्रदेश) द्वारा सम्मान, कला स्तम्भ मध्य प्रदेश द्वारा सम्मान, भारत श्रीलंका सम्मिलित साहित्य सम्मान और अखिल भारतीय हिन्दी सेवा समिति द्वारा प्रदत्त सम्मान आदि हैं। शीलू की विशेष उपलब्धि गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में रचना का शामिल होना है। आपकी लेखनी का उद्देश्य साहित्य में उत्कृष्ट लेखन का प्रयास है। मुन्शी प्रेमचंद, निराला, तुलसीदास, सूरदास, अमृता प्रीतम इनके पसंदीदा हिन्दी लेखक हैं तो प्रेरणापुंज गुरु हैं। इनका जीवन लक्ष्य-हिन्दी साहित्य में कार्य व समाजसेवा है। देश और हिंदी भाषा के प्रति विचार-“हिन्दी हमारी रग-रग में बसी है।”