डॉ.विद्यासागर कापड़ी ‘सागर’
पिथौरागढ़(उत्तराखण्ड)
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मानव तन पाया है पगले,
जीवन है अनमोल।
मन माधव को भज ले अब तो,
अरे न इत उत डोल॥
पाप पुण्य सब पथ पर होंगे,
रखना इतना ध्यान।
थोड़े से सद्गुण हैं भू पर,
हैं दुर्गुण की खान॥
अंधा बन कर बैठ गया क्यूँ ,
मन रे आँखें खोल।
मन माधव को भज ले अब तो,
अरे न इत उत डोल…॥
बूँद सुधा की होगी प्यारे,
कालकूट के ताल।
पथ पर खड़े मिलेंगे तुझको,
दोष कई विकराल॥
बच जायेगा राम नाम रस,
रसना में तू घोल।
मन माधव को भज ले अब तो,
अरे न इत उत डोल…॥
गहरा सागर भव का तेरी,
बड़ी पुरानी नाव।
जग के झंझट में पड़कर तू,
पाता नित नव घाव॥
चतुर सियारों ने पहने हैं,
बस बाहर से खोल।
मन माधव को भज ले अब तो,
अरे न इत उत डोल…॥
आना जाना छूटेगा तू,
हो जायेगा पार।
उदर कूप का झंझट मिटता,
नाम बने आधार॥
क्या करना था करता क्या था,
बातें सारी तोल।
मन माधव को भज ले अब तो,
अरे न इत उत डोल…॥
राम नाम के चोले से कर,
निज का तू श्रिंगार।
पंचविकारों की नौका तो,
डूबेगी मँझधार॥
सदा देखता औरों को तू,
निज को कभी टटोल।
मन माधव को भज ले अब तो,
अरे न इत उत डोल…॥
मानव तन पाया है पगले,
जीवन है अनमोल।
मन माधव को भज ले अब तो,
अरे न इत उत डोल…॥