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पिताजी

देवेन्द्र कुमार ध्रुव
गरियाबंद(छत्तीसगढ़ )
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मुझे लगता था वो मुझे डांटने-दबाने में लगे रहे,
मैं गलत था,वो तो मुझे ऊपर उठाने में लगे रहे।

उनके टोकने,और रोकने से मैं खीझ जाता,
मगर मेरे पिता मुझे बेहतर बनाने में लगे रहे।

मैं जिद में अड़ जाता,बड़ी हसरतें करता,
वो चुपचाप मेरी जरूरतें जुटाने में लगे रहे।

उनके बलबूते मैं अपने नसीब पे इतराता हूँ,
वो मुझे,अपने पैरों पे खड़ा कराने में लगे रहे।

अपनी ख्वाहिशें दबाकर ईंट की दीवारों में,
वो बनके बुनियाद मेरा घर बनाने में लगे रहे।

उनको अक्सर भूखा सोना पड़ता मेरे कारण,
अपना पेट काट,वो मुझे खिलाने में लगे रहे।

कुछ जोड़ी कपड़े,फ़टे और घिसे हुए जूते,
मुझे सब नया दिलाने,वो पुराने में लगे रहे।

धूप-छाँव-सी जिंदगी,खुद अंधेरे में काटकर,
वो तो मेरी दुनिया रौशन कराने में लगे रहे।

अब अकेला पड़ा तो सबकी अहमियत जानी,
क्यों ता-उम्र वो रिश्ते-नाते निभाने में लगे रहे।

परिचय- देवेन्द्र कुमार ध्रुव का स्थाई निवास छत्तीसगढ़ के ग्राम बेलर(जिला-गरियाबंद)में है। इनकी जन्म तारीख २४ अक्टूबर १९८८ एवं जन्म स्थान-बेलर (फिंगेश्वर)है। शहर बेलर से सम्बन्ध रखने वाले देवेन्द्र जी की शिक्षा-स्नातकोत्तर और कार्यक्षेत्र-अध्यापन(सहा. शिक्षक) है। सामाजिक गतिविधि में आप सक्रिय सहभागिता से विभिन्न आयोजनों में संचालन करते हैं। इनकी लेखन विधा-कविता,मुक्तक तथा ग़ज़ल है। रचनाओं का प्रकाशन आंचलिक पत्र-पत्रिकाओं में हुआ है।जिला स्तर पर आप साहित्यकार सम्मान पा चुके हैं। विशेष उपलब्धि-आंचलिक कवि सम्मेलनों में सहभागिता है। आपकी लेखनी का उद्देश्य-मन की बातें सबके सम्मुख रखना और हिन्दी का प्रचार करना है। आपके लिए प्रेरणा पुंज-पिताजी की कविता है। रुचि लेखन में ही है।