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प्रतिशतों का मकड़जाल

पवन प्रजापति ‘पथिक’
पाली(राजस्थान)
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प्रतिशतों के मकड़ झाल में उलझे बच्चे अस्सी- नब्बे फीसदी अंक प्राप्त करके भी उस प्रसन्नता से वंचित है,जो हमें कभी ‘मात्र उत्तीर्ण’ हो जाने पर ही मिल जाती थी। ये वो दौर था जब हम अंकतालिका में सिर्फ उत्तीर्ण या अनुत्तीर्ण वाला कॉलम ही देखा करते थे। प्रतिशत वाले कॉलम पर कभी हमारी नजर जाती ही नहीं थी। तृतीय श्रेणी प्राप्त करने वाला भी खुशी- खुशी मिठाई खिलाता था। यानि जो खुशी हमें ‘मात्र उत्तीर्ण’ हो जाने पर मिल जाया करती थी, आज के बच्चों को अस्सी-नब्बे फीसदी अंक प्राप्त करने पर भी नहीं मिलती है। कक्षा में एकाध लड़का प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण हो जाता था,तो पूरे विद्यालय में उसका रूतबा किसी हस्ती से कम न था। आज-कल तो साठ प्रतिशत अंक प्राप्त करने वाले बच्चे के साथ उसके माता-पिता भी ऐसा व्यवहार करते हैं, मानो उसने कोई गम्भीर अपराध कर दिया हो।
देखा जाये तो एक परम्परा चल पड़ी है जिसके तहत एक कागज पर लिखे गए कुछ अंकों के आधार पर ही बच्चे की योग्यता का आंकलन किया जाता है। जरा सोचें जो लड़के हमारे साथ पढ़ते थे,क्या सभी पढ़ाई में होशियार थे ? क्या जो पढ़ाई में कमजोर थे,क्या उन्होंने अपने जीवन में सफलता प्राप्त नहीं की ? क्या जो होशियार थे,सभी लड़कों ने आशानुरूप ही सफलता हासिल की ?
कुल मिलाकर कहने का अर्थ ये है कि बच्चों से उम्मीद जरूर रखें,लेकिन उम्मीदों को बच्चों पर बोझ ना बनने दें। कागज पर लिखे कुछ अंकों से आपके बच्चे की योग्यता कम या ज्यादा नहीं होती। हर बच्चा ईश्वर की कृति है और अपने- आपमें अद्वितीय है।

परिचय-पवन प्रजापति का स्थाई निवास राजस्थान के जिला पाली में है। साहित्यिक उपनाम ‘पथिक’ से लेखन क्षेत्र में पहचाने जाने वाले श्री प्रजापति का जन्म १ जून १९८२ को निमाज (जिला-पाली)में हुआ है। इनको भाषा ज्ञान-हिन्दी,अंग्रेजी एवं राजस्थानी का है। राजस्थान के ग्राम निमाज वासी पवन जी ने स्नातक की शिक्षा हासिल की है। इनका स्वयं का व्यवसाय है। लेखन विधा-कविता,लेख एवं कहानी है। ब्लॉग पर भी कलम चलाने वाले ‘पथिक’ की लेखनी का उद्देश्य-मानव कल्याण एवं राष्ट्रहित के मुद्दे उठाना है। आपकी दृष्टि में प्रेरणा पुंज-स्वामी विवेकानन्द जी हैं। इनकी विशेषज्ञता- भावनात्मक कविता एवं लघुकथा लेखन है।