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प्रभु की रचना…

हीरा सिंह चाहिल ‘बिल्ले’
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

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रचनाशिल्प:मापनी- प्रति चरण १६ मात्रा, मुखड़ा ४ चरणों का, तथा तीन अंतरे ८-८ चरणों के

प्रभु की रचना, कितनी न्यारी,
जीव-जगत ने हर सुख पाया।
मन का मौसम, तन की खुशियाँ,
अंग सृष्टि का इन्हें बनाया॥
प्रभु की रचना…

धरती और गगन दोनों ही,
इक-दूजे का प्रेम सजाते।
सूरज, चाँद-किरण से अपनी,
पहरों में धरती चमकाते।
धरती, अम्बर, नदियाँ, सागर,
मेघ सजाकर जल बरसाते।
जीवन की खातिर ही प्रभु ने,
स्वार्थ-हीन यह प्रेम सजाया॥
प्रभु की रचना…

मैं भी कोशिश करता रहता,
साहित्यिक गीतों को रचता।
प्रेम भावना मैं रच पाऊं,
तब तो प्रेमी भी कहलाऊँ।
हे प्रभुजी कुछ ज्ञान मुझे दो,
कुछ दाता मुझको सिखला दो।
जब ऐसा कुछ हो पायेगा,
तभी लगेगा मैं सज पाया॥
प्रभु की रचना…

मन मेरा तुमको ही भजता,
जीवन प्रभुजी सुखमय रहता।
आधार सुखों का तुमको मानूं,
कुछ-कुछ सृष्टि-जगत पहचानूँ।
प्रेम-प्यार, अरु भक्ति भावना,
सजें तभी जीवन सुख आया।
मैं रच लूँ अब गीत प्रेम के,
तब समझूँ मैं भी सज पाया॥
प्रभु की रचना…

परिचय–हीरा सिंह चाहिल का उपनाम ‘बिल्ले’ है। जन्म तारीख-१५ फरवरी १९५५ तथा जन्म स्थान-कोतमा जिला- शहडोल (वर्तमान-अनूपपुर म.प्र.)है। वर्तमान एवं स्थाई पता तिफरा,बिलासपुर (छत्तीसगढ़)है। हिन्दी,अँग्रेजी,पंजाबी और बंगाली भाषा का ज्ञान रखने वाले श्री चाहिल की शिक्षा-हायर सेकंडरी और विद्युत में डिप्लोमा है। आपका कार्यक्षेत्र- छत्तीसगढ़ और म.प्र. है। सामाजिक गतिविधि में व्यावहारिक मेल-जोल को प्रमुखता देने वाले बिल्ले की लेखन विधा-गीत,ग़ज़ल और लेख होने के साथ ही अभ्यासरत हैं। लिखने का उद्देश्य-रुचि है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-कवि नीरज हैं। प्रेरणापुंज-धर्मपत्नी श्रीमती शोभा चाहिल हैं। इनकी विशेषज्ञता-खेलकूद (फुटबॉल,वालीबाल,लान टेनिस)में है।

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