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बजट:शिक्षा और स्वास्थ्य में क्रांतिकारी पहल जरूरी

डॉ.वेदप्रताप वैदिक
गुड़गांव (दिल्ली) 
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कोई सरकार कैसा भी बजट पेश करे, विरोधी दल उसकी आलोचना न करें, यह संभव ही नहीं है। विरोधी दलों की आलोचनाएं हमेशा असंगत होती हैं, ऐसा भी नहीं है। वे कई बार सरकार और संसद को नई दिशा भी दे देती हैं। इस बार भी कुछ विरोधी दलों ने इस बजट को किसान और मजदूर-विरोधी बताया है और सरकार से पूछा है कि उसने अपना खर्च इतना ज्यादा बढ़ा लिया है तो वह पैसा कहां से लाएगी ?, लेकिन सरकार के इस बजट की ज्यादातर वित्तीय विशेषज्ञ तारीफ कर रहे हैं। वे वित्तमंत्री निर्मला सीतारमन द्वारा अब तक पेश किए गए बजटों में इसे सर्वश्रेष्ठ बता रहे हैं। किसी भी सरकार से यह उम्मीद करना कि, वह अपने बजट का इस्तेमाल करते समय अपने मत-बैंक पर ध्यान नहीं देगी, गलत है। चुनावों से चुनी जाने वाली कोई भी सरकार अपने हर कदम को सबसे पहले मत बैंक की तराजू पर तौलती है। इस दृष्टि से यह बजट काफी सफल रहा है, क्योंकि यह देश के लगभग ४५ करोड़ मध्यम वर्गों के लोगों को काफी राहत दे रहा है। आयकर से ७ लाख तक की आमदनी को मुक्त कर देना अपने-आपमें सराहनीय कदम है। यदि लोगों के पास पैसा ज्यादा बचेगा तो वे खर्च भी ज्यादा कर सकेंगे। इससे बाजारों में चुस्ती पैदा होगी। अर्थव्यवस्था अपने-आप मजबूत होगी। जनसंघ और भाजपा के अनुयायियों में मध्यम वर्ग के लोग ही ज्यादा रहे हैं। ये लोग सुशिक्षित और प्रभावशाली भी हैं। पत्रकारिता और अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों में इस वर्ग की पकड़ काफी मजबूत है। इसके अलावा इस बजट में बुर्जुर्गों, महिलाओं, आदिवासियों और कमजोर वर्गों के लिए भी तरह-तरह की सुविधाएं प्रदान की गई हैं। देश के ८० करोड़ लोगों को मुफ्त राशन की घोषणा पहले ही हो चुकी है। किसानों को इस साल २० लाख करोड़ रु. का ऋण दिया जाएगा। बच्चों में रक्ताल्पता की कमी को दूर करने के लिए सरकार इस बार ज्यादा खर्च करेगी। नए हवाई अड्डे तो बनेंगे ही, लेकिन रेल-प्रबंध भी बेहतर बनाया जाएगा। नितिन गडकरी की देखरेख में सड़क-निर्माण कार्य तेजी से हो ही रहा है। डिजिटल लेन-देन में यूँ भी भारत दुनिया के देशों में अग्रगण्य है, लेकिन उसे अब अधिक बढ़ाया जाएगा। ऐसी कई पहल इस बजट में हैं, लेकिन शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में जो क्रांतिकारी पहल भारत को करना चाहिए, उसके संकेत बहुत हल्के हैं। किसी भी राष्ट्र को सुखी और संपन्न बनाने के लिए इन दोनों मुद्दों पर जोर देना बहुत जरूरी है। शोध और शिक्षा का माध्यम जब तक भारतीय भाषाओं में नहीं होगा और चिकित्सा में पारंपरिक भारतीय पद्धतियों को प्रोत्साहित करने के लिए विशेष बजट नहीं बनेगा, भारत की प्रगति की रफ्तार तेज नहीं हो पाएगी।

परिचय– डाॅ.वेदप्रताप वैदिक की गणना उन राष्ट्रीय अग्रदूतों में होती है,जिन्होंने हिंदी को मौलिक चिंतन की भाषा बनाया और भारतीय भाषाओं को उनका उचित स्थान दिलवाने के लिए सतत संघर्ष और त्याग किया। पत्रकारिता सहित राजनीतिक चिंतन, अंतरराष्ट्रीय राजनीति और हिंदी के लिए अपूर्व संघर्ष आदि अनेक क्षेत्रों में एकसाथ मूर्धन्यता प्रदर्शित करने वाले डाॅ.वैदिक का जन्म ३० दिसम्बर १९४४ को इंदौर में हुआ। आप रुसी, फारसी, जर्मन और संस्कृत भाषा के जानकार हैं। अपनी पीएच.डी. के शोध कार्य के दौरान कई विदेशी विश्वविद्यालयों में अध्ययन और शोध किया। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त करके आप भारत के ऐसे पहले विद्वान हैं, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय राजनीति का शोध-ग्रंथ हिन्दी में लिखा है। इस पर उनका निष्कासन हुआ तो डाॅ. राममनोहर लोहिया,मधु लिमये,आचार्य कृपालानी,इंदिरा गांधी,गुरू गोलवलकर,दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी सहित डाॅ. हरिवंशराय बच्चन जैसे कई नामी लोगों ने आपका डटकर समर्थन किया। सभी दलों के समर्थन से तब पहली बार उच्च शोध के लिए भारतीय भाषाओं के द्वार खुले। श्री वैदिक ने अपनी पहली जेल-यात्रा सिर्फ १३ वर्ष की आयु में हिंदी सत्याग्रही के तौर पर १९५७ में पटियाला जेल में की। कई भारतीय और विदेशी प्रधानमंत्रियों के व्यक्तिगत मित्र और अनौपचारिक सलाहकार डॉ.वैदिक लगभग ८० देशों की कूटनीतिक और अकादमिक यात्राएं कर चुके हैं। बड़ी उपलब्धि यह भी है कि १९९९ में संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत का प्रतिनिधित्व किया है। आप पिछले ६० वर्ष में हजारों लेख लिख और भाषण दे चुके हैं। लगभग १० वर्ष तक समाचार समिति के संस्थापक-संपादक और उसके पहले अखबार के संपादक भी रहे हैं। फिलहाल दिल्ली तथा प्रदेशों और विदेशों के लगभग २०० समाचार पत्रों में भारतीय राजनीति और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर आपके लेख निरन्तर प्रकाशित होते हैं। आपको छात्र-काल में वक्तृत्व के अनेक अखिल भारतीय पुरस्कार मिले हैं तो भारतीय और विदेशी विश्वविद्यालयों में विशेष व्याख्यान दिए एवं अनेक अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलनों में भारत का प्रतिनिधित्व किया है। आपकी प्रमुख पुस्तकें- ‘अफगानिस्तान में सोवियत-अमेरिकी प्रतिस्पर्धा’, ‘अंग्रेजी हटाओ:क्यों और कैसे ?’, ‘हिन्दी पत्रकारिता-विविध आयाम’,‘भारतीय विदेश नीतिः नए दिशा संकेत’,‘एथनिक क्राइसिस इन श्रीलंका:इंडियाज आॅप्शन्स’,‘हिन्दी का संपूर्ण समाचार-पत्र कैसा हो ?’ और ‘वर्तमान भारत’ आदि हैं। आप अनेक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों और सम्मानों से विभूषित हैं,जिसमें विश्व हिन्दी सम्मान (२००३),महात्मा गांधी सम्मान (२००८),दिनकर शिखर सम्मान,पुरुषोत्तम टंडन स्वर्ण पदक, गोविंद वल्लभ पंत पुरस्कार,हिन्दी अकादमी सम्मान सहित लोहिया सम्मान आदि हैं। गतिविधि के तहत डॉ.वैदिक अनेक न्यास, संस्थाओं और संगठनों में सक्रिय हैं तो भारतीय भाषा सम्मेलन एवं भारतीय विदेश नीति परिषद से भी जुड़े हुए हैं। पेशे से आपकी वृत्ति-सम्पादकीय निदेशक (भारतीय भाषाओं का महापोर्टल) तथा लगभग दर्जनभर प्रमुख अखबारों के लिए नियमित स्तंभ-लेखन की है। आपकी शिक्षा बी.ए.,एम.ए. (राजनीति शास्त्र),संस्कृत (सातवलेकर परीक्षा), रूसी और फारसी भाषा है। पिछले ३० वर्षों में अनेक भारतीय एवं विदेशी विश्वविद्यालयों में अन्तरराष्ट्रीय राजनीति एवं पत्रकारिता पर अध्यापन कार्यक्रम चलाते रहे हैं। भारत सरकार की अनेक सलाहकार समितियों के सदस्य,अंतरराष्ट्रीय राजनीति के विशेषज्ञ और हिंदी को विश्व भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने के लिए कृतसंकल्पित डॉ.वैदिक का निवास दिल्ली स्थित गुड़गांव में है।

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