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भक्ति में दिखावा नहीं हो

हीरा सिंह चाहिल ‘बिल्ले’
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
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शक्ति, भक्ति और दिखावा…

भारतवर्ष में इन दिनों (१५ से लेकर २४ अक्टूबर) इस वर्ष (२०२३) का नवरात्र त्योहार चल रहा है। मान्यता है कि, इन ९ दिनों में प्रति दिन ‘दुर्गा माता’ के ९ रूप अवतरित होते हैं। इस तथ्य से सम्बंधित एक महत्वपूर्ण कथा यह भी है कि, त्रेता युग में भगवान श्री राम ने रावण वध करने से पहले शक्ति अर्जित करने के लिए दुर्गा माता के ९ रूपों की पूजा-अर्चना की थी।
रावण अब तक का सबसे विद्वान एवं शक्तिशाली राजा (लंकेश) था, परन्तु इसके बावजूद उसमें एक निर्गुण भी था ‘अभिमान’ का, जिसका रावण दिखावा भी करता था।९ देवियों की पूजा करके भगवान श्री राम ने रावण वध किया। इसीलिए, इस सार्दीय-नवरात्र के अगले (दसवें) दिन ‘दशहरे के त्योहार में रावण प्रतिमा का दहन किया जाता है।
उपरोक्त कथन एक तरह से नवरात्र में ९ देवियों के पूजन से शक्ति अर्जित करने और अभिमान का दिखावा करके स्वयं को नष्ट करने के यथार्थ को फलीभूत करता है।
इन दिनों में भक्त उपवास करते हैं। प्रति दिन दुर्गा माॅं के अलग रूपों की पूजा-अर्चना करते हैं। मन्दिरों में नंगे पाॅंव जाकर देवी दर्शन करते हैं। भक्तों की आस्था है कि, माता उन्हें शक्ति देती है, तभी वे ऐसा कर पाते हैं। यह बात किसी हद तक सही भी है।
हर गाॅंव-शहर की बस्तियों में माॅं दुर्गा की प्रतिमा उनके ९ रूपों के साथ स्थापित की जाती है और हर विधि-विधान से पूजन होता है।
भारतीय लोगों की यह आस्था सौ प्रतिशत सही है। कई जगह में इस आस्था की सत्यता देखने को मिली है,
वहीं भक्ति का दूसरा रूप भी देखने को मिलता है, जिसे भक्ति नहीं; दिखावा कहना ज्यादा उचित होगा।
समय के साथ-साथ मानवीय कृत्यों में बहुत से बदलाव हुए हैं। विशेष कर वर्तमान यांत्रिक युग का। यदि निष्पक्ष समीक्षा की जाए तो, अब भक्ति बहुत ही कम रह गई है। अधिकतर दिखावा ही प्रदर्शित होता है।
छोटे शहरों में तो यहाॅं तक होता है कि, डी.जे., बैण्ड- पार्टी, नृत्य मण्डली इत्यादि की उपलब्धता के अनुसार ही ‘विसर्जन’ होने लगे हैं, जो वेद-पुराण के अनुसार बिल्कुल गलत है। सत्यता को परखते हुए मेरा व्यक्तिगत मत है कि, इस वर्तमान दिखावा रूपी युग के लिए बहुत कुछ जिम्मेदार भारत वर्ष की शिक्षा पद्धति भी-ही है क्योंकि, शायद हमारे देश के किसी भी पाठ्यक्रम में पुरातन काल, वेद-पुराणों का विवरण, भारतीय महात्माओं की जानकारी, इत्यादि नहीं मिलते।

खैर, जहाॅं तक ‘शक्ति, भक्ति और दिखावा’ की बात है तो वर्तमान परिवेश में सिर्फ १० प्रतिशत भक्ति है और नब्बे ९० दिखावा। इस गणना से शक्ति का हिसाब लगाया जा सकता है।

परिचय–हीरा सिंह चाहिल का उपनाम ‘बिल्ले’ है। जन्म तारीख-१५ फरवरी १९५५ तथा जन्म स्थान-कोतमा जिला- शहडोल (वर्तमान-अनूपपुर म.प्र.)है। वर्तमान एवं स्थाई पता तिफरा,बिलासपुर (छत्तीसगढ़)है। हिन्दी,अँग्रेजी,पंजाबी और बंगाली भाषा का ज्ञान रखने वाले श्री चाहिल की शिक्षा-हायर सेकंडरी और विद्युत में डिप्लोमा है। आपका कार्यक्षेत्र- छत्तीसगढ़ और म.प्र. है। सामाजिक गतिविधि में व्यावहारिक मेल-जोल को प्रमुखता देने वाले बिल्ले की लेखन विधा-गीत,ग़ज़ल और लेख होने के साथ ही अभ्यासरत हैं। लिखने का उद्देश्य-रुचि है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-कवि नीरज हैं। प्रेरणापुंज-धर्मपत्नी श्रीमती शोभा चाहिल हैं। इनकी विशेषज्ञता-खेलकूद (फुटबॉल,वालीबाल,लान टेनिस)में है।