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भारत की सामाजिक चेतना पर बढ़ता संकट ‘आर्थिक असमानता’

पूनम चतुर्वेदी शुक्ला
लखनऊ (उत्तरप्रदेश)
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भारत विविधता में एकता का संदेश देने वाला देश है, लेकिन यही देश वर्तमान में आर्थिक असमानता जैसी चुनौती से जूझ रहा है जो सामाजिक न्याय, अवसरों की बराबरी और समावेशी विकास को चुनौती दे रही है। ‘विश्व असमानता रिपोर्ट २०२६’ के ताज़ा निष्कर्षों के अनुसार भारत में संपत्ति और आय का विभाजन काफी अधिक असंतुलित है। शीर्ष १० प्रतिशत आबादी के पास लगभग ६५ प्रतिशत संपत्ति है, जबकि नीचे के ५० प्रतिशत के पास केवल लगभग ६ प्रतिशत संपत्ति है। इसके अलावा देश के शीर्ष १ प्रतिशत के पास कुल संपत्ति का लगभग ४० प्रतिशत हिस्सा है- यह एक अत्यंत केंद्रित और गहन विभाजन का संकेत है।
आर्थिक असमानता केवल आँकड़ों की समस्या नहीं है, यह जीवन के वास्तविक अवसरों को प्रभावित करती है। जब केवल कुछ क्षेत्रों या वर्गों के पास संपत्ति और संसाधन केंद्रित होते हैं, तब शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं तक समान पहुंच बनाना और कठिन हो जाता है। इसी रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि भारत में आय असमानता भी उच्च स्तर पर बनी हुई है। शीर्ष १० प्रतिशत लोग राष्ट्रीय आय का लगभग ५८ प्रतिशत हिस्सा प्राप्त करते हैं, जबकि नीचे के ५० प्रतिशत लोगों को केवल लगभग १५ प्रतिशत मिलता है।
यह असमानता केवल आर्थिक परिसंपत्तियों तक सीमित नहीं है, इसका प्रभाव सामाजिक समावेशन पर भी गहरा है। महिला श्रम शक्ति भागीदारी दर भारत में केवल लगभग १५.७ प्रतिशत है, जो दुनियाभर के औसत से काफी कम है। यह दर्शाता है कि लैंगिक असमानता अभी भी आर्थिक असमानता के भीतर कैसे समाहित है। यानी महिलाओं के आर्थिक अवसरों की कमी न केवल लैंगिक न्याय का मुद्दा है, बल्कि सामाजिक और आर्थिक असमानता की बड़ी तस्वीर का हिस्सा भी बन रही है। इन आँकड़ों से स्पष्ट होता है कि भारत के विकास के मॉडल में सात्विक प्रगति और सामाजिक न्याय के बीच एक विरोधाभास मौजूद है।
यदि किसी समाज में शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी सेवाएँ, सुरक्षित आवास और रोज़गार तक पहुंच समान रूप से उपलब्ध नहीं है, तो गरीब और मध्यम वर्ग के लिए अवसर सीमित हो जाते हैं। इससे समावेशी विकास की दिशा कमजोर होती है और सामाजिक विभाजन गहरा जाता है।
सरकार ने इस असमानता को कम करने के लिए कई नीति-उपाय अपनाए हैं-जैसे महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा), प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम और दीनदयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन। इन पहलों का उद्देश्य रोजगार, स्वरोजगार और सामाजिक सुरक्षा के माध्यम से आर्थिक अवसरों का विस्तार करना है। रिपोर्ट के अनुसार २०२५ तक भारत में लगभग ६४.३ प्रतिशत आबादी सामाजिक सुरक्षा प्रणालियों के अंदर आ गई है, जो अलग-अलग सुरक्षा जाल, जैसे- सार्वजनिक वितरण प्रणाली, पेंशन और सामाजिक सहायता योजनाओं के विस्तार का परिणाम है। यह एक सकारात्मक संकेत है कि व्यापक सामाजिक सुरक्षा कवरेज ने गरीब और कमजोर वर्गों तक पहुँच बढ़ाई है, लेकिन अभी भी करीब ३६ प्रतिशत आबादी इस दायरे से बाहर है, जो असमानता की समस्या को पूरी तरह समाप्त नहीं करती है।
आर्थिक असमानता का सामाजिक प्रभाव बहुत गहरा है। जब आय और संपत्ति का वितरण असंतुलित होता है, तो मानव पूंजी के निर्माण पर असर पड़ता है-अर्थात व्यक्ति की शिक्षा, स्वास्थ्य और कौशल विकास पर नकारात्मक प्रभाव होता है। उदाहरण के लिए- महंगी उच्च शिक्षा और निजी विद्यालयों की उपलब्धता ऐसे परिवारों के लिए एक असमान अवसर बन जाती है जो आर्थिक रूप से मजबूत हैं, जबकि गरीब परिवारों के बालिकाएँ और बालक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से वंचित रह जाते हैं। यही असमानता सामाजिक गतिशीलता को सीमित करती है।
आर्थिक असमानता का प्रभाव स्वास्थ्य सेवाओं पर भी स्पष्ट दिखाई देता है। उच्च आय वाले व्यक्तियों और मध्यम वर्ग के लोगों के पास बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध होती हैं,जैसे-निजी अस्पताल, विशेषज्ञ चिकित्सक, और स्वास्थ्य बीमा, जबकि गरीब वर्ग को सीमित सार्वजनिक सेवाओं पर निर्भर रहना पड़ता है। आयुष्मान भारत जन आरोग्य योजना जैसी योजनाएँ इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि वे गरीब और मध्यम वर्ग को स्वास्थ्य सुरक्षा देती हैं और गंभीर रोगों के इलाज को किफायती बनाती हैं। यह योजना अबतक ४२.७८ करोड़ व्यक्तिगत स्वास्थ्य कार्ड दे चुकी है, जिससे लाखों लोग समर्थन पा रहे हैं, खासकर महिलाओं और बुज़ुर्गों के लिए स्वास्थ्य सेवाएँ सुलभ बनती हैं।
सिर्फ स्वास्थ्य ही नहीं, टिकाऊ और समावेशी रोजगार भी आवश्यक है। असमानता के बड़े पैमाने पर होने का अर्थ है कि रोजगार के अवसरों में विभाजन भी मौजूद है। युवाओं की प्रतिस्पर्धा और डिजिटल अर्थव्यवस्था के विस्तार ने रोजगार हासिल करने की चुनौती को और तीव्र कर दिया है। आर्थिक सर्वेक्षण २०२५-२६ में इस दिशा में यह चिंता जताई गई कि डिजिटल लत, स्मार्टफोन और स्क्रीन समय का अत्यधिक उपयोग युवाओं की उत्पादकता और कामकाजी क्षमता पर प्रतिकूल असर डाल सकता है, जिससे उनकी रोजगार पाने की क्षमता प्रभावित होती है। यह दिखाता है कि असमानता न केवल धन के वितरण में है, बल्कि कौशल और अवसरों की विभाजन में भी है। जब हम सामाजिक न्याय की व्यापक तस्वीर देखते हैं, तो यह स्पष्ट होता है कि लैंगिक असमानता, आय का असंतुलन और संपत्ति का सांद्रण एक-दूसरे से जुड़े हैं। विश्व असमानता रिपोर्ट का एक प्रमुख निष्कर्ष यह है कि वैश्विक स्तर पर महिलाएँ प्रति कमाई पर कम आय अर्जित करती हैं, और भारत में महिलाओं की आय असमानता और भी अधिक तीव्र है। देश के आर्थिक वितरण मॉडल को यदि असमान रूप से संचालित होने से रोका नहीं गया, तो यह सामाजिक स्थिरता, समावेशी विकास और समान अवसरों के मूल सिद्धांतों को चुनौती देता रहेगा।

इसके लिए पुनर्वितरण, सामाजिक निवेश और समावेशी नीतियाँ अपनानी होंगी। प्रगतिशील कराधान, सार्वजनिक निवेश जैसे सार्वभौमिक शिक्षा, स्वास्थ्य और सेवाओं का सुदृढ़ नेटवर्क और उत्पादक रोजगार सृजन के अवसर-ये सभी मिलकर असमानता को नियंत्रित करने में मदद करेंगे। आज असमानता की यह चुनौती नीति निर्माता, समाज और हर नागरिक के लिए परीक्षण की घड़ी है। क्या हम एक ऐसे भारत का निर्माण करेंगे, जहाँ समानता केवल शब्दों में नहीं, बल्कि वास्तविकता में भी मौजूद हो ?