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मन ही मन मैं रो रहा

गोलू सिंह
रोहतास(बिहार)
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यह वासना का दलदल है,
यह काया का मायाजाल है
सुंदर चेहरे के पीछे बिछ रहा अब जंजाल है,
अब हर तरफ बातें नहीं,बातों में वेश्यावृत्ति है
भविष्य इसका उज्जवल है,घर-घर में यह कुरुति है,
किस रिश्ते को लिखूं विस्तार कर शर्मशार खुद मैं हो रहा…
ऐसी हालत देख माधव मन ही मन मैं रो रहा।

ऐ विधाता तेरी लेखनी सर्व अंत क्यों लिखती नहीं ?
दृश्य जो उचित नहीं,उसे देख दृष्टि क्यों थकती नहीं ?
क्या जा चुके ध्यान मग्न में ?
सुनते क्यों विनती नहीं ?
ध्यान से देखो धरा पर धर्म की गिनती नहीं।

कहीं मैं भी पिस ना जाऊं कलयुग के इस काल में…!
दोषी तुम कहना नहीं,
घिरा हूँ मैं इस हाल में।
तन से तन का बस रिश्ता बचा,तन से तन का है हो रहा,
ऐसी हालत देख माधव मन ही मन मैं रो रहा।

है प्रश्न तुमसे-ऐ प्रभु सूर्य फिर भी क्यों निकलता है ?
साक्षी है,निरन्तर है,चुप फिर भी क्यों रहता है ?
कहता अगर वह सिर्फ न्याय होता,
यह अपराध क्यों वह करता है ?

वासना को जीतने मैं किसकी शरण में जाऊं ?
कलयुग अगर सर्वज्ञ है,राम-राम कैसे पाऊं ?
राम ही जब सर्वेसर्वा कलि में फिर क्यों अझूराऊं ?
कलि के प्रभाव में कितने कलि का ग्रास से हो रहा,
ऐसी हालत देख माधव मन ही मन मैं रो रहाl

दो जवाब तुम या मुक्ति दो,
या जीतने की शक्ति दो…
या हे राम अपनी भक्ति दो,
आने वाले भविष्य में माधव कुछ सही ना हो रहाl
ऐसी हालत देख माधव मन ही मन मैं रो रहा…ll
(इक दृष्टि यहाँ भी:कलि=कलयुग, अझूराऊं=जाल में फंसना)

परिचय-गोलू सिंह का जन्म १६ जनवरी १९९९ को मेदनीपुर में हुआ है। इनका उपनाम-गोलू एनजीथ्री है।lनिवास मेदनीपुर,जिला-रोहतास(बिहार) में है। यह हिंदी भाषा जानते हैं। बिहार निवासी श्री सिंह वर्तमान में कला विषय से स्नातक की पढ़ाई कर रहे हैं। इनकी लेखन विधा-कविता ही है। लेखनी का मकसद समाज-देश में परिवर्तन लाना है। इनके पसंदीदा कवि-रामधारी सिंह `दिनकर` और प्रेरणा पुंज स्वामी विवेकानंद जी हैं।