पद्मा अग्रवाल
बैंगलोर (कर्नाटक)
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३८ वर्षीय मेघना अपने घर की बॉलकनी से डूबते सूरज को देख रही थी, आसमान में चारों तरफ उदासी के पीले बादल छाये हुए थे। उसके मन का एक कोना भीगा हुआ था। रह-रह कर उसका मन हिचकोले खा रहा था, वह अजीब तरह का सूनापन महसूस कर रही थी।
आँसुओं की गरम-गरम बूंदें उसकी आँखों से टपक रहीं थीं। आज वह स्वयं को रोक भी नहीं पा रही थी।
अम्मा के व्यवहार से ऐसा प्रतीत होता है, कि मानों वह उनके लिए एटीएम मशीन बन कर रह गई है।
कल की ही तो बात है, वह बड़े प्यार से बोलीं, “मेघना मेरी बच्ची कितनी मेहनत करती है। मैं तुम्हारे लिए अदरक वाली चाय बना कर लाती हूँ।”
वह समझ गई थी, कि वह उससे कुछ कहना चाहती है- “आप क्यों बनाओगी ? बीना बना देगी, वह आ रही होगी।“
“आपको मुझसे कुछ कहना है ?“
“हाँ, रीना के बेटा हुआ है। वह बहुत धूमधाम से फंक्शन कर रहे हैं।“
“कब कर रहे हैं ?“
“१० अगस्त।“
“अभी तो दिन हैं।“
“ठीक है, कितने रुपए चाहिए ?“
“आज दोपहर भर मैं लिस्ट बनाती रही। मून के लिए चेन, अंगूठी, चाँदी के बर्तन, कम से कम ११ जोड़ी कपड़े, घऱ में सबके लिए कपड़े लिफाफे…।“
“१ लाख में हो जाएगा।“
वह खीझ कर बोली,-“मुझे बिल्कुल फुर्सत नहीं है। मैं रुपए ट्रांसफर कर दूंगी। उन्हें जो चाहिए, वह खरीद लें।”
अम्मा हाथ नचा कर बोलीं थीं,- “भला ऐसा भी कहीं होता है!“
वह अपना फैसला सुना कर अपने कमरे में जाकर लेट गई थी। और अपने अतीत में खो गई। रमन के साथ प्यार और शादी के हसीन सपने सजा रही थी, कि एक दिन पापा के एक्सीडेंट के कारण उसके सारे सपने धूलधूसरित हो गए थे। पापा के ऑफिस में उसको प्रतिनियुक्ति मिल गई और फिर वह उनकी छोड़ी हुई जिम्मेदारियों को पूरा करने मे जुट गई थी।
मलय उस समय इंटर में था और नीरा ग्रेजुएशन कर रही थी। घर का खर्च, उन दोनों की पढ़ाई, फिर शादी करते-करते वह असमय बूढ़ी दिखने लगी थी। बालों में चाँदनी छिटक गई थी, आँखों के नीचे काले घेरे बन गए थे, आँखों पर मोटा चश्मा, चेहरे पर गहरी उदासी छा गई थी। सदा चहकने खिलखिलाने वाली मेघना जिम्मेदारियों के बोझ तले कहीं खो गई थी और उसकी जगह धीर-गंभीर स्त्री बन गई थी।
अब अम्मा का मन यहाँ नहीं लगता। उससे कहतीं-“मेघना तुम्हारे यहाँ दिन काटे नहीं कटता। कभी मलय की बहू के पैर भारी हैं, तो कभी नीरा अकेली है, वह बुला रही है” कह कर चली जातीं। और आतीं भी तो वहीं की यादों मे खोई रहतीं। कई बार वह सोचती भी, कि अम्मा उसकी सगी अम्मा हैं या सौतेली! कभी भूल कर भी उसकी शादी के बारे में नहीं सोचतीं। यदि कोई कहता है, तो व्यंग्य से हँस कर कहतीं,- अब शादी की उमर रह गई है क्या ?”
तभी मोबाइल की घंटी ने उनकी तंद्रा भंग कर दी, उधर मलय था। “दी सो रही थी क्या ?” वह घबराया हुआ बोला,”दी तबियत तो ठीक है न ?
उसके प्यार भरे बोल ने उन्हें भावुक कर दिया था- “अरे कहा न, मैं बिल्कुल ठीक हूँ।अम्मा, नीरा के बच्चे के लिए सामान भेजने को कह रहीं थीं।“
“दी, आप बिल्कुल भी फिक्र न करना, मैंने सब इंतजाम कर लिया है।
दी मेरे बॉस लखनऊ ऑफिस के काम से आ रहे हैं। वह लखनऊ घूमना चाहते हैं।
दी प्लीज, मेरे लिए २ दिन का समय निकाल लो। संडे सुबह पहुंचेंगें। क्लार्क अवध में रुक रहे हैं।“
भला कभी वह भाई की बात टाल सकती है। आखिर भाई के बॉस का मामला था। मेघना ने कोई कोर- कसर नहीं छोड़ी थी। ‘अतिथि देवो भव’ को ध्यान में रखते हुए वह मन ही मन बॉस के खड़ूस चेहरे की कल्पना करती रही थी, लेकिन उसके बॉस जय पहली नजर में ही उसके दोस्त बन गए थे। इमामबाड़ा, रेजीडेंसी, विधानसभा, हजरतगंज, आम्बेडकर पार्क घूमते-घूमते कब नजदीकियां बढ गई, पता ही नहीं चला था। मस्तमौला से जय बात-बात पर ठहाके लगा कर हँसते। वह भी बरसों के बाद इतना खुल कर हँसी थी। जाते समय जब वह बोले, “जल्दी मिलेंगें” उस दिन उन्हें महसूस हो रहा था कि जैसे कोई अपना उन्हें अकेला छोड़ कर चला गया हो। वह उदास और मायूस हो गई थी, तभी फिर से मलय का फोन आया,-”दी मेरे बॉस आपको कैसे लगे।“
“तुम तो ऐसे पूछ रहे हो, जैसे रिश्ता करने जा रहे हो” कह कर वह फीकी सी हँसी हँस दी थी.
“सच दी, बस आपकी ‘हाँ’ सुननी है।
मेघना का चेहरा शर्म से लाल हो उठा था। उनकी आँखों के सामने जय का मुस्कुराता हुआ चेहरा घूमने लगा था।
अगला हफ्ता बहुत गहमागहमी से भरा हुआ था। सादे समारोह में वह जय की पत्नी और जूनियर जय की माँ भी बन गई थी। मेघना फूली नहीं समा रही थी, वह अपने पूरे परिवार के साथ मुस्कुराती हुई फोटो शूट करवा रही थी।
“मेरे भाई, तुमने परिवार के अर्थ को सार्थक कर दिया।”