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राजनीति का अब संस्कृत पर वार

कुछ दिन पहले कॉंग्रेस के प्रमुख प्रवक्ता जयराम रमेश ने संसद में दिए गए उनके एक भाषण का अंश ट्वीटर पर डाला था। यह वक्तव्य राजभाषाओं के लिए बजट आवंटन हेतु था, जिसमें श्री रमेश ने कहा था कि जहां संस्कृत के लिए सरकार ने ₹६०० करोड़ से अधिक आवंटित किए, वहां कन्नड़, तमिल, मलयालम व तेलुगू आदि भाषाओं के लिए प्रति भाषा लगभग ₹२०-२५ करोड़ ही दिया। चूंकि, उनका भाषण और ट्वीटर अंग्रेजी में थे, तो मैंने भी उस पर अंग्रेजी में अपनी टिप्पणी देते हुए कहा कि यदि उनका उक्त विषय पर भाषण भी किसी विदेशी भाषा की जगह देश की भाषा में होता तो उनका संदेश एक बड़े समूह तक पहुंच पाता।

मेरी टिप्पणी पर कुछ लोगों ने आलोचनात्मक टिप्पणियां की, जिनका संक्षिप्त सार यह है-
यदि मैं भारतीय भाषाओं का इतना ही बड़ा समर्थक हूँ, तो मैंने क्यों अपनी टिप्पणी अंग्रेजी में की ?
हम हिन्दी क्षेत्र के लोग अहिंदी भाषी नागरिकों से तो अपेक्षा करते हैं कि, वे हिंदी सीखें, लेकिन स्वयं कोई अन्य भाषा सीखना नहीं चाहते।
हालांकि, मेरे आलोचक मेरी आलोचना में शालीनता दिखा सकते थे, फिर भी मुझे उनसे कोई व्यक्तिगत शिकायत नहीं है, लेकिन उन्होंने जो २ बातें मुझसे कही, मैं उनसे पूर्णतया सहमत हूँ। मैंने उन्हें उत्तर देते हुए क्षमा याचना की और कहा कि, यह हम लोगों की हानि है कि हमें कन्नड़ बल्कि कोई अन्य भारतीय भाषा नहीं आती। उत्तर में मैंने यह भी कहा कि, चूंकि मैं अन्य भाषाओं में लिख नहीं सकता और यदि मैं हिंदी में लिखता तो लोग कहते कि मैं हिंदी ज़बरन थोप रहा हूँ, अतः मैंने अपनी टिप्पणी अंग्रेजी में की।
बहरहाल, इस प्रसंग से कुछ सबक अवश्य मिले। सबसे बड़ी बात तो यह कि राजनीति केवल हिंदी के विरुद्ध ही नहीं हो रही है, बल्कि संस्कृत तो राजनेताओं को और भी बड़ा विवाद का विषय दे देगी। यह खुशी की बात है कि सरकार संस्कृत को प्रोत्साहन देने का प्रयास कर रही है, पर बाकी पुरातन भाषाओं को भी साथ लेकर चलने से कोई स्वयं के साथ भेदभाव अनुभव नहीं करेगा। बजट आवंटन आदि में और अधिक पारदर्शिता व सम्बंधित राज्य सरकारों की भागीदारी से इस प्रक्रिया को एक सही आकार दिया जा सकता है।
इसके अलावा मेरा मानना है कि, अब समय आ गया है कि अहिंदी भाषाओं की शिक्षा हिंदीभाषी क्षेत्रों में भी दें।यदि केंद्र सरकार इस तरह की कोई पहल करती है तो उससे हो सकता है कि, जो कटुता हिंदी के प्रति कट्टर अहिंदीभाषी लोगों में भरी हुई है, वह थोड़ी कम होगी। भाषाओं से सम्बंधित मुद्दे बहुत अधिक संवेदनशील हैं, अतः हमारी आक्रामक सोच इस विषय पर खाई को और बड़ा कर सकती है। अतः शनैः पंथाः।
◾रविदत्त गौड़ (राजस्थान)

संस्कृत-भाषियों की संख्या पिछली जनगणना में लगभग ३२ हजार लोगों ने स्वयं को संस्कृत भाषी बताया था। मज़े की बात तो यह है कि, उस समय, और आज भी भारत में लगभग १५ लाख विद्यालय हैं। इनमें लगभग ६ लाख संस्कृत शिक्षक हैं। यदि ये शिक्षक ही संस्कृत को अपनी भाषा बता देते तो देश में कम से कम ६ लाख संस्कृत भाषी गिनती में आ जाते।

देश में भाषा की पूंछ पकड़ वैतरणी पार करने की परम्परा चल पड़ी है। भोजपुरी वाले सोचते हैं कि, अगर उसे आठवीं अनुसूची में स्थान मिल जाए तो भोजपुरी के नाम पर अकादमी बने, अनुदान मिले, सैर-सपाटा हो और उसमें परीक्षा देकर उनके भांजे-भतीजे आइएएस बन जाएं। मैथिली को अलग भाषा की मान्यता दिलवाने के पीछे सबसे बड़ी प्रेरणा यही थी, लेकिन सबसे त्रासद तथ्य यह है कि, भारत की सभी भाषाओं पर एक अकेली अंग्रेजी ही बहुत भारी पड़ रही है।
इस समूह में ही अनेक ऐसे महानुभाव होंगे, जो हस्ताक्षर अंग्रेजी में करते हैं। हम जब तक अंग्रेजी की दासता से मुक्ति नहीं पाते, तब तक स्व भाषाओं का अस्तित्व बचाने की सोचना भी शेख चिल्ली के सपने देखने जैसा होगा। हम हिन्दी में ही लिखें, निजी जीवन की छोटी-छोटी सूचियाँ, टिप्पणियाँ, ई- संदेश, व्हाट्सैप संदेश हिन्दी-नागरी में ही लिखें और जिसे नहीं आता; उसे लिखना सिखाएं, तभी हिन्दी का अस्तित्व बना रहेगा। वाणिज्यिक वस्तुओं पर और दुकानों में भी हिन्दी के आग्रही बनें। हिन्दी को आम प्रचलन- फैशन में लाए बिना उसके प्रसार की सोचना भी दिवास्वप्न है। संस्कृत ? वयं संस्कृत भाषा अपि प्रयोग करिष्याम:संस्कृत मम भारत वर्षस्य गौरवम्। लगभग ३२ हजार, किन्तु लगभग १.४ अरब भारतीयों में केवल ३२ हजार! इतने कम क्यों ? संस्कृत सीखना कोई रॉकेट विज्ञान तो है नहीं। आज की तर्क-प्रवण पीढ़ी तो गूढ़ से गूढ़ विज्ञान आसानी से सीख लेती है, तो संस्कृत क्यों नहीं ? निज भाषा, निज संस्कृत के गौरवबोध से शून्य हैं हम। और अंग्रेज़ी से आक्रान्त, पराभूत, वशीभूत, दासता-प्रसूत।
◾रामवृक्ष सिंह (उप्र)

जी नहीं, संस्कृत बोलने वाले २ हजार नहीं, बल्कि संस्कृत को मातृभाषा मानने वाले हैं।

◾राजेश्वर उनियाल (महाराष्ट्र)

तमिलभाषियों का हिन्दी विरोध हमेशा से ही राजनीतिक रहा है, नवोदय विद्यालयों का विरोध इसी आधार पर किया गया। पूरे देश में ६४५ नवोदय हैं तमिलनाडू को छोड़कर। नवोदय में हिन्दीभाषी राज्यों के छात्रों को कोई एक अन्य भारतीय (हिन्दीतर) भाषा सिखाई जाती है और अहिंदीभाषी राज्य में हिन्दी। तमिलनाडू की राजनीति ही नहीं चाहती है कि, दूसरे राज्यों के लोग उनकी भाषा सीखें।

◾प्रवीण जैन (महाराष्ट्र)

सत्ता पाने के लिए सब जायज है। यह भाषा का नहीं, भाषा की राजनीति का खेल है, जो तमिलनाडू और कुछ हिंदीतरभाषी राज्यों में ही नहीं, बिहार, झारखंड, उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान, छत्तीसगढ़ जैसे हिंदीभाषी राज्यों में अष्टम अनुसूची के नाम पर भी खेला जा रहा है। स्वार्थी तत्वों के तो स्वार्थ, बाकी अपने को अतिशिक्षित माननेवाले भी क्षेत्रवाद के बहाव में बिना खेल समझे बह जाते हैं। इस खेल में संस्कृत किसी की नहीं, जो सबकी है, उसके साथ खड़े होने वाला कोई नहीं। भारत की भारतीयता बिना संस्कृत संभव ही नहीं, लेकिन क्षेत्रवाद यह समझता नहीं।

हिंदी बनाम क्षेत्रीय भाषा को लेकर जितने भी विवाद नेताओं द्वारा खड़े किए जाते हैं, उनमें कहीं भी कुछ भी राष्ट्रीय एकता या भारतीय भाषाओं को या अपने राज्य की भाषा को बढ़ाने की बात नहीं है। राजनीति का मुख्य उपकरण है ‘बांटो और वोट बैंक बनाओ, फिर राज करो।’ जाति, मजहब, क्षेत्रवाद आदि के अलावा भाषा भी देश की जनता को बांटने का एक बहुत बड़ा उपकरण है, या यूँ कहें कि राष्ट्रीय एकता को काटने वाली एक तलवार है। कुर्सी के लिए क्षेत्रवादी नेता इसका इस्तेमाल करते रहते हैं। इन्हें देश की नहीं, केवल और केवल अपनी कुर्सी की चिंता होती है। जानती तो यह भी है कि, जो कुछ कर रहे हैं वह देश के लिए घातक है, लेकिन सत्ता के लिए सब जायज है।
◾डॉ. मोतीलाल गुप्ता ‘आदित्य’ (महाराष्ट्र)

(सौजन्य:वैश्विक हिंदी सम्मेलन, मुम्बई)

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