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राष्ट्रभाषा हिंदी के लिए संपूर्ण जीवन होम किया ‘दादा’ ने

डॉ. विकास दवे
इंदौर (मध्यप्रदेश )
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प्रसंगवश:कैलाशचंद्र पंत….

यह हम सबका सौभाग्य था, कि मध्य प्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति और हिंदी भवन न्यास को अनेक वर्षों से पूज्य दादा पद्मश्री कैलाश चंद्र पंत का सानिध्य और स्नेहाशीश प्राप्त होता रहा। लगभग ४० वर्ष की अनथक तपस्या का पर्याय है हिंदी भवन न्यास और इस गंगा से निःसृत
गंगा के भगीरथ थे परम श्रद्धेय कैलाश चंद्र पंत। उनके संपूर्ण जीवन को हम देखते हैं, तो जिस बात का मुझे सर्वाधिक आश्चर्य होता है; वह यह है कि कोई व्यक्ति एक ही पथ पर अनथक यात्री की तरह लगातार अधिकतम कितने समय तक चल सकता है ? श्रद्धेय पंत जी ने राष्ट्रभाषा हिंदी के लिए अपना संपूर्ण जीवन होम किया और इस कार्य को करते हुए अपनी अवस्था के उत्तरार्द्ध तक आकर भी वे इस तप को पूर्णविराम तो ठीक अल्पविराम तक देना उचित नहीं समझते थे।
अभी पिछले सप्ताह की ही बात है, वे अत्यधिक अस्वस्थता के दौर से गुजर रहे थे किंतु जब उनसे मिला तो हँस कर सबसे पहले उनकी चिंता व्यक्त हुई भी तो भाषा और साहित्य की वर्तमान स्थिति पर। हिंदी को मात्र राष्ट्रभाषा नहीं, बल्कि विश्व भाषा बना देने का स्वप्न दादा की आँखों में पलता था। वृद्धावस्था से शरीर भले ही थोड़ा अशक्त हुआ था, किंतु नेत्रों का आत्मविश्वास अंत तक छलक-छलक पड़ता था। वह जब भी बोलते, उनके मुख से केवल और केवल हिंदी सेवा से जुड़े विषयों की ही बात होती। इन दिनों, जबकि युवा पीढ़ी को हम अपनी वृत्ति (नौकरी) में भी वर्ष-२ वर्ष में परिवर्तन करते देखते हैं, ऐसे में राष्ट्र और समाज जीवन को समर्पित इन सात-आठ दशकों का हिसाब लगाना आसान नहीं है। श्रद्धेय दादा ने मध्यप्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के माध्यम से एक और जहाँ भाषा को लेकर गांधी जी द्वारा देखे गए सपनों को साकार करने का प्रयास किया है, वहीं दूसरी ओर हिंदी भवन न्यास के माध्यम से भोपाल ही नहीं; बल्कि संपूर्ण मध्यप्रदेश में साहित्य और भाषा की गतिविधियों को नवीन और उदात्त आयाम प्रदान किए। आज हिंदी भवन न्यास को हम जिस श्रेष्ठतम स्वरूप में पाते हैं, उसके पीछे श्रद्धेय दादा का तपस्वी जीवनकाल नींव की तरह हमें दिखाई देता है। इन समस्त गतिविधियों के साथ-साथ दादा ने कभी भी व्यक्तिगत रचनाकर्म को तिलांजलि नहीं दी। वे लगातार लिखते रहे। उनके भीतर का पत्रकार और संपादक कभी विश्राम नहीं करता।अभी अस्वस्थता के दौर में भी लगातार समाचार पत्रों में सम-सामयिक स्तंभ लिखकर वे राष्ट्रीय और सांस्कृतिक चेतना से ओत-प्रोत अपने आलेखों से समाज जागरण का काम अनवरत कर रहे थे। उनके द्वारा लिखे गए आलेखों के अनेक संग्रह पुस्तक आकार में प्रकाशित होकर हिंदी भवन न्यास की धरोहर बन चुके हैं।
विगत दिनों दादा के सम्मानों की सूची में एक माणिक और जुड़ गया। उन्हें केंद्र सरकार ने पद्मश्री से अलंकृत किया। हालांकि, दादा के सम्मानों की सूची को जब हम देखते हैं तो सूची को पढ़ते-पढ़ते स्वाभाविक रूप से हम थक जाते हैं, सूची पूरी नहीं होती, किंतु पद्म अलंकरण के पश्चात हम सबके मन में २ संकल्प जागृत हुए। पहला मध्यप्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति द्वारा दादा का एक नागरिक अलंकरण किया जाना और दूसरा स्वप्न था दादा पर ‘अक्षरा’ पत्रिका का एक सुंदर-सा विशेषांक का प्रकाशन करना। प्रथम स्वप्न तो अतिशीघ्र साकार हो गया। पूज्य दादा के प्रति अगाध श्रद्धा रखने वाले अनेक परिजनों ने मिलकर यह तय किया कि उनका एक विराट नागरिक अभिनंदन का कार्यक्रम हिंदी भवन न्यास के परिसर में संपन्न हो; वह हुआ भी और सबने मिलकर एक बड़ी सम्मान राशि एकत्र कर दादा को भेंट की, किंतु इस तरह की बड़ी धनराशि को भी स्वीकार कर यदि अपनी तिजोरी में रख लें तो फिर वह सब कुछ हो सकते हैं-कैलाश चंद्र पंत नहीं। अत्यंत निस्पृह भाव से दादा ने स्वयं को भेंट की सम्मान राशि ‘अक्षरा’ के लिए बनाई गई अक्षय निधि हेतु समर्पित कर दी।
दादा ने देश, समाज, भाषा और साहित्य को इतना कुछ दिया है कि उनके इस ऋण से हम सब कभी भी उऋण नहीं हो सकते। हिंदी भवन न्यास का मंत्री संचालक का उत्तरदायित्व मुझे सौंपने के लिए वह जिस तरह से दृढ़ प्रतिज्ञ हो गए थे, वह मेरे लिए अत्यंत संकोच का कारण बन रहा था। मेरे अत्यधिक आग्रह के बाद भी उन्होंने अंततः अपने हृदय की आवाज को धीमा नहीं होने दिया और मुझे यह गुरुत्तर उत्तरदायित्व सौंप कर इस धरोहर को संभालने के लिए विवश कर दिया। आज उनके जाने के बाद उस दृश्य को स्मरण करके आँखें भीग रही है, जब उन्होंने एकांत में मुझे भावुक करते हुए केवल इतना कहा था हिंदी भवन न्यास का काम आपको संभालना ही है। मैंने जब आग्रह किया कि मैं अगस्त के बाद इस दायित्व को निर्वहन करने में अपने-आपको अधिक सुलभ पा रहा हूँ तो उन्होंने अंतिम अस्त्र चलाते हुए कहा -“क्या इस बूढ़े को शांति से मरने भी नहीं दोगे ? अगस्त तक का समय आपके पास होगा, मेरे पास नहीं है। पता नहीं, वह वाक्य शायद ईश्वर ने ही उनसे कहलवाया था। ३१ जुलाई को दादा का विदा होना मुझे इस अंतिम वाक्य का स्मरण करा रहा है। अब तो उनके प्रेरणा तत्व को ऊर्जा तत्व में परिवर्तित करके उन्हीं के कामों को आगे बढ़ाना है। पूज्य दादा के प्रति विनम्र भाव से श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ।

(लेखक वरिष्ठ बाल साहित्यकार, ‘अक्षरा’ पत्रिका के सम्पादक एवं मंत्री-संचालक मध्यप्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति हैं)