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वाह री जिन्दगी

नताशा गिरी  ‘शिखा’ 
मुंबई(महाराष्ट्र)
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अब सब अपना पलड़ा झाड़ रहे हैं,
अपने अस्तित्व को ही न जाने किस रंग में ढाल रहे हैं।

दिलचस्पी रही न अब राधा या श्री राम में,
दो जून की रोटी के आगे पिज्जा-बर्गर निहार रहे हैं।

सास-बहू के नाटक ने रामायण का पाठ भुलाया है,
रूद्राभिषेक किसे कहते हैं ?,क्या बच्चों को बतलाया है।

महामृत्युजंय जाप है क्या ?,हम आज खुद भूल गए हैं,
संस्कृत के श्लोकों से अब दूर-दूर तक न कोई नाता है।

हर शनिचर को अब सुंदरकांड कहाँ सुनने में आता है,
अलंकार कितने प्रकार के ?,इसका उत्तर हमें कहाँ आता है।

अनुरोध बस इतना करूँगी,वर्तमान में आप सबसे,
सोचिए-समझिए,न पलड़ा झाड़िए इन प्रश्नों से।

अंग्रेजी के आगे अपनी भाषा को न बिसरा दें हम,
शेक्सपियर के आगे मुंशी प्रेमचंद को न भुला दें हम।

महाभारत,रामायण,गीता का जीवन में इक बार पाठ करो,
धर्म-संस्कार कॆ साथ रहो,या सारांश का ही संवाद करो।

श्री वाल्मीकि और व्यास जी को कहीं दिल में जिन्दा रख लो,
इस सुंदर संस्कृति में खुद चित्रण का,कहीं तुम स्मरण भी कर लो॥

परिचय-नताशा गिरी का साहित्यिक उपनाम ‘शिखा’ है। १५ अगस्त १९८६ को ज्ञानपुर भदोही(उत्तर प्रदेश)में जन्मीं नताशा गिरी का वर्तमान में नालासोपारा पश्चिम,पालघर(मुंबई)में स्थाई बसेरा है। हिन्दी-अंग्रेजी भाषा का ज्ञान रखने वाली महाराष्ट्र राज्य वासी शिखा की शिक्षा-स्नातकोत्तर एवं कार्यक्षेत्र-चिकित्सा प्रतिनिधि है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत लोगों के शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य की भलाई के लिए निःशुल्क शिविर लगाती हैं। 
लेखन विधा-कविता है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-जनजागृति,आदर्श विचारों को बढ़ावा देना,अच्छाई अनुसरण करना और लोगों से करवाना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-मुंशी प्रेमचंद और प्रेरणापुंज भी यही हैं। विशेषज्ञता-निर्भीकता और आत्म स्वाभिमानी होना है। देश और हिंदी भाषा के प्रति विचार-“अखण्डता को एकता के सूत्र में पिरोने का यही सबसे सही प्रयास है। हिन्दी को राष्ट्रीय भाषा घोषित किया जाए,और विविधता को समाप्त किया जाए।”