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स्वयं से रूबरू होने का लक्ष्य बनाएं

ललित गर्ग
दिल्ली

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सफल एवं सार्थक जीवन के लिये व्यक्ति और समाज दोनों अपना विशेष अर्थ रखते हैं। व्यक्ति समाज से जुड़कर जीता है, इसलिए समाज की आँखों से वह अपने-आपको देखता है। साथ ही उसमें यह विवेकबोध भी जागृत रहता है ‘मैं जो हूँ,जैसा भी हूँ’ इसका मैं स्वयं जिम्मेदार हूँ। उसके अच्छे-बुरे चरित्र का बिम्ब समाज के दर्पण में तो प्रतिबिम्बित होता ही है,उसका स्वयं का जीवन भी इसकी प्रस्तुति करता है। यह सही है कि हम सबकी एक सामाजिक जिंदगी भी है। हमें उसे भी जीना होता है। हम एक-दूसरे से मिलते हैं,आपस की कहते-सुनते हैं। हो सकता है कि आप बहुत समझदार हों। लोग आपकी सलाह को तवज्जो देते हों,पर यह जरूरी नहीं कि आप अपने आस-पास घट रही हर घटना पर सलाह देने में लगे रहें। हम सबकी एक अपनी अलग दुनिया भी होती है,जिसके लिए समय निकालना भी जरूरी होता है,क्योंकि आध्यात्मिकता जिंदगी जीने का तरीका है खुद के साथ-साथ दूसरों से उचित व्यवहार करने काl इसके जरिए हम खुद में झांक सकते हैं,हालात का बेहतर विश्लेषण कर सकते हैं और फिर,हर परेशानी एवं समस्या का हल खुद के भीतर ही होता है। हालांकि,अदृश्य शक्ति पर विश्वास से मुँह नहीं मोड़ सकते,लेकिन शक्ति खुद के भीतर ही मौजूद है और आत्मा से ही निकलती है। भीतरी शक्ति को बाहर निकालकर नाममुकिन को भी मुमकिन किया जा सकता है।
ये हम पर ही है कि हम चाहें तो बिखर जाएं या पहले से बेहतर बन जाएं। हाथ में आए मौके को लपक लें या फिर उसे दूसरों के हाथों में जाने दें। आप बुरी किस्मत कहकर खुद को दिलासा भी दे देते हैं,लेकिन सच यही है कि यह भाग्य पर नहीं,स्वयं पर निर्भर करता है। आप वही बन जाते हैं,जो आप चुनते हैं। लेखक स्टीफन कोवे कहते हैं,-‘मैं अपने हालात से नहीं,फैसलों से बना हूँ।’ अक्सर हम सब सोचते हैं कि यदि अवसर मिलता तो एक बढ़िया काम करते। कलाकार अपनी श्रेष्ठ कृति के सृजन के लिए अबाधित एकांत खोजता है। कवि निर्जन वन में अपने शब्द पिरोता है। योगी शांत परिवेश में स्वयं को टटोलता है। छात्र परीक्षा की तैयारी के लिए रातों को जागता है,क्योंकि उस समय शांति होती है और उसे कोई परेशान या बाधित नहीं करता। दफ्तर और कुटुम्ब की गहन समस्याओं पर विचार करने के लिए एवं व्यापार-व्यवसाय की लाभ-हानि के द्वंद् से उपरत होने के लिए हम थोड़ी देर अकेले में जा बैठते हैं। योगी और ध्यानी कहते हैं कि आँखें बंद करो और चुपचाप बैठ जाओ, मन में किसी तरह के विचार को न आने दो-समस्याओं से जूझने का यह एक तरीका है,पर गीता का ज्ञान वहां दिया गया जहां दोनों ओर युद्ध के लिए आकुल-व्यग्र सेनाएं खड़ी थी। श्रीकृष्ण को ईश्वर का रूप मान लें तो सुननेवाले अर्जुन तो सामान्यजन ही थे। आज भी खिलाड़ी दर्शकों के शोर के बीच अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर दिखाते हैं। अर्जुन ने भरी सभा में मछली की आंख को भेदा था। असल में सृजन और एकाग्रता के लिए,जगत के नहीं,मन के कोलाहल से दूर जाना होता है। हम सब कुछ बड़ा करना चाहते हैं। कुछ बड़ा हासिल करने के सपने देखते हैं। कुछ ऐसा,जिससे हमारी अलग पहचान बन सके। यह चाहते सब हैं,पर कामयाब बहुत कम ही हो पाते हैं। कारण कि हम खुद को पूरी तरह अपने काम में डुबो नहीं पाते। नेतृत्व कोच रॉबिन शर्मा कहते हैं,-‘कुछ बड़ा करने के लिए जरूरी है कि हम ध्यान भटकाने वाली चीजों से दूर रहें। इसके लिए अपने रास्ते पर ध्यान होना बेहद जरूरी है।`
एक जिज्ञासु अपनी समस्याओं के समाधान के लिए खोजते-खोजते संत तुकाराम के पास पहुंचाl उसने देखा तुकाराम एक दुकान में बैठे कारोबार में व्यस्त थे। वह दिनभर उनसे बात करने की प्रतीक्षा करता रहा और संत तुकाराम सामान तौल-तौल कर बेचते रहे। दिन ढला तो वह बोला-‘मैं आप जैसे परम ज्ञानी संत की शरण में ज्ञान पाने आया था,समाधान पाने आया था,लेकिन आप तो सारा दिन केवल कारोबार करते रहे। आप कैसे ज्ञानी हैं ? आपको प्रभु भजन या धूप-दीप-बाती करते तो एक क्षण भी नहीं देखा। मैं समझ नहीं पाया कि लोग आपको संत क्यों मानते हैं ?’ इस पर संत तुकाराम बोले-‘मेरे लिए मेरा काम ही पूजा है,ध्यान है,पूजा-अर्चना है,मैं कारोबार भी प्रभु की आज्ञा मानकर करता हूँ। जब-जब सामान तौलता हूँ,तराजू की डंडी संतुलित स्थिर होती है,तब-तब मैं अपने भीतर जागकर मन की परीक्षा लेता हूँ कि तू जाग रहा है न ? तू समता में स्थित है या नहीं ? साथ-साथ हर बार ईश्वर का स्मरण करता हूँ,मेरा हर पल,हर कर्म ईश्वर की आराधना है।’ और जिज्ञासु ने कर्म और भक्ति का पाठ सीख लिया। कोई भी सृजन हो, सफलता हो,कर्म हो या शक्ति का अर्जन हो,महज प्रार्थना से नहीं आती,बल्कि हमारे व्यवहार,कार्य,एकाग्रता,निष्ठाशील व्यवहार से आती है।
आजकल भगवान की आराधना का रिश्ता केवल मतलब का होता हैl जब कभी कुछ चाहिए,दौड़कर भगवान के आगे हाथ फैलाकर मांग लिया। मांगने से भगवान देनेवाला नहीं है। भगवान उन्हीं को देता है जो एकाग्रता और पवित्रता के साथ अपना कर्म करते हैं। आध्यात्मिक सोच आसपास विश्वास की जोत जगाती है। विश्वास जहां सच में,प्यार में,व्यवस्था में,कर्म में,लक्ष्य में होता है,वहां आशा जीवन बन जाती है। जब कभी इंसान के भीतर द्वंद् चलता है तो जिंदगी का खोखलापन उजागर होने लगता है। अक्सर आधे-अधूरे मन और निष्ठा से हम कोई भी कार्य करते हैं तो उसमें सफलता संदिग्ध हो जाती है फिर हम झटपट अदृश्य शक्ति से रिश्ता नाता गढ़ने लगते हैं।
अक्सर मौत से जूझ रहे व्यक्ति के लिए उसकी सलामती के लिए हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं,जबकि हमारी प्रार्थना मौत से जूझ रहे व्यक्ति की सलामती के लिये संघर्ष कर रहे चिकित्सकों के दिमाग और हाथों के संतुलन के लिए होनी चाहिए। जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं है,यह जानते हुए भी हम हर कीमत पर खुद को सुरक्षित कर लेना चाहते हैं। कई बार सुरक्षा का यह एहसास इतना ज्यादा होता है कि हम जरा से बदलाव से डर जाते हैं। अपने सुरक्षित घेरे से बाहर कदम ही नहीं निकाल पाते। लेखिका और पहली बधिर एवं दृष्टिहीन स्नातक हेलन केलर कहती हैं,- ‘सुरक्षा एक अंधविश्वास ही है। जीवन या तो एक साहसिक रोमांच है या फिर कुछ भी नहीं।’
आदमी का अच्छा या बुरा होना भाग्य,परिस्थिति या कोई दूसरे व्यक्ति के हाथ में नहीं होता। ये सब कुछ घटित होता है हमारे स्वयं के शुभ-अशुभ भावों से,संकल्पों से। हम,आप,सभी जैसा सोचते हैं,जैसा चाहते हैं,वैसा ही बन जाते हैं। मैं क्या होना चाहता हूँ,इसका जिम्मेदार मैं स्वयं हूँ। मनुष्य जीवन में तभी ऊंचा उड़ता है,जब उसे स्वयं पर भरोसा हो जाए कि मैं अनन्त शक्ति संपन्न हूँ,ऊर्जा का केन्द्र हूँ। अन्यथा जीवन में आधा दु:ख तो इसलिए उठाए फिरते हैं कि,हम समझ ही नहीं पाते हैं कि सच में हम क्या हैं ? क्या हम वही हैं,जो स्वयं को समझते हैं ? या हम वो हैं जो लोग हमें समझते हैं।

कितनी बार हम दूसरों से ही नहीं,खुद से भी झूठ बोलते रहते हैं। हालात बुरे होते हैं,पर हम मन को सुकून देने वाली झूठी बातों को ही जीते जाते हैं। दूसरों में उनका दिखावा भी करते रहते हैं। नतीजा,ना हालात बदलते हैं और ना ही व्यक्तियों और वस्तुओं से हमारे संबंध। लेखिका डायना हार्डी कहती हैं,-‘कड़वा सच, मीठे झूठे से कम नुकसान पहुंचाता है,और सबसे बड़ा झूठ वह है,जो हम खुद से बोलते हैं। अपने-आपसे जब तक रूबरू नहीं होते,लक्ष्य की तलाश और तैयारी दोनों अधूरी रह जाती है। स्वयं की शक्ति और ईश्वर की भक्ति भी नाकाम सिद्ध होती है और यही कारण है कि जीने की हर दिशा में हम औरों के मोहताज बनते हैं,औरों का हाथ थामते हैं,उनके पदचिन्ह खोजते हैं। कब तक हम औरों से मांगकर उधार के सपने जीते रहेंगे। कब तक औरों के साथ स्वयं को तौलते रहेंगे और कब तक बैसाखियों के सहारे मंजिलों की दूरी तय करते रहेंगेl यह जानते हुए भी कि बैसाखियां सिर्फ सहारा दे सकती है,गति नहीं ? हम बदलना शुरू करें अपना चिंतन,विचार,व्यवहार,कर्म और भाव।

ललित गर्ग,बी-380, निर्माण विहार, प्रथम माला दिल्ली-110092 मो, 9811051133