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हो जाए पुलकित तन-मन

रत्ना बापुली
लखनऊ (उत्तरप्रदेश)
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पावन सावन, मन का आँगन…

उर सागर से लेकर जल,
नैना जो बरसाए सावन
हो जाए पुलकित तन-मन,
भीग जाए मन का आँगन।

हे मही, तू क्यों इतराया,
जब जग में सावन बरसाया
यहाँ तो नैना रोज बरसते,
प्रिय मिलन को तरसते।

माना तेरा धरती से मिलन,
करता हरियाली का जतन
बुझाता है यह नैना भी,
सबके मन की अगन।

देख कर तेरा अपरिम सौन्दर्य,
बहक जाता है सबका मन
प्रिय की विरह वेदना,
तब बुझाती जल लवण।

तेरे बरसने की सावन,
नहीं है कोई सीमा
पर नयन बरसन की,
होती है एक सीमा।

तू जब बरसता है धरती पर,
होता जल का अप्लावन।
पर उर धरणी के आँगन,
होती शान्ति व वंदन॥