हरिहर सिंह चौहान
इन्दौर (मध्यप्रदेश )
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पृथ्वी जल रही है,
कौन सुनेगा ‘करुण’ पुकार ?
गाँव-जंगल ‘गुम’ हो गए शहरों में,
कोई सुनता ही नहीं…?
कहीं आँधी, कहीं तूफान,
गिर रही बर्फ बैमोसम
बिगड़ता ही जा रहा दुनिया का पर्यावरण,
पृथ्वी जल रही है…।
इंसान सही में ‘बोझ’ बन चुका है,
अपने लालच के लिए धरती को बांट दिया
प्रदूषण, पर्यावरण सबके-सब दूषित हो गए,
और पृथ्वी जल रही है…।
हमारी जीवन शैली ने, सब खत्म कर दिया,
हवा, पानी, बिजली के प्रति हमारी उदासीनता ने
बिगाड़ दिया पृथ्वी का मूल स्वरूप,
तभी तो पृथ्वी जल रही है…।
जागो, अब तो जागो,
अपनी धरती को बचाओ।
पृथ्वी पर सकारात्मकता का बीज बोएं अब हम,
अपनी पृथ्वी को बचाएंगे, क्योंकि पृथ्वी जल रही है…॥