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जज्बात… जाने कहाँ गुम

दीप्ति खरे
मंडला (मध्यप्रदेश)
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जज्बातों का कारवां अगर साथ हो,
तो रिश्ते बन ही जाते हैं
दिल के झरोखे में झांक कर देखो,
तो कुछ अक्स दिख ही जाते हैं।

जज्बातों को जब हमने चाहा,
बयां करना जो अल्फाजों में
बस नजरें साथ देती हैं,
लब खामोश रह जाते हैं।

रिश्ता सच्चा वही जो,
दिल के जज्बातों को समझे
कई रिश्ते अक्सर जमाने को,
दिखाने निभाए जाते हैं।

दिल के जज्बात ,धड़कनों का शोर,
न जाने कब कहाँ गुम हो गए
आजकल रिश्ते निभाते-निभाते लोग,
दुनियादारी के मेले में खो जाते हैं।

व्यावहारिकता के इस दौर में,
जज्बातों की कदर कहाँ ?
जरूरत के हिसाब से यहाँ,
हर रिश्ते निभाए जाते हैं।

दिल के झरोखे से झाँक कर देखो,
तो कुछ अक्स दिख ही जाते हैं।
जज्बातों का कारवां अगर साथ हो,
तो रिश्ते बन ही जाते हैं॥