ममता सिंह ‘विशिष्ट’
धनबाद (झारखंड)
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काश! मैं चरित्रहीन ही होती,
तो मैं खुद में ही खुश हो जाती
काश! मैं भी बेईमान ही होती,
तो ईमानदारी न मुझे सताती।
काश! मैं भी एक बेदर्द ही होती,
मुझे औरों का दर्द नज़र न आता
काश! मैं भी संस्कारहीन ही होती,
तो संस्कार का पाठ नहीं जानती।
काश! काश! काश! काश! काश!,
इस जमाने में अच्छे गए हवा में
बुरे का ही तो अब बोलबाला है,
सच्चे नहीं, झूठा ही दिलवाला है।
जो मुखौटा लगाया करता है,
वही तो यहाँ अच्छा दिखता है
जो भी यहाँ पर सच्चा होता है,
वो हर दिन-रात चोट खाता है।
बेटा माँ-बाप को नहीं पहचानता है,
वो बीवी-बच्चों के साथ खुश रहता है
किसी रिश्ते का यहाँ भरोसा नहीं,
हर रिश्ता तार-तार होता रहता है।
बेटा-बेटी में आज भी फर्क बहुत है,
जब दहेज का राक्षस उसे सताए
चाहे जितना भी बेटी पढ़-लिख जाए,
दहेज बिना बेटी की शादी हो न पाए।
वर पक्ष को अपने रुतबे की चिंता,
कन्या पक्ष को बेटी के भविष्य की चिंता
जहां पर हो पैसों का ही बोलबाला,
वहाँ बेटी के जीवन का नहीं रखवाला।
काश! मैं भी चरित्रहीन ही होती,
तो मैं खुद में ही खुश हो जाती।
काश! मैं भी बेईमान ही होती,
ईमानदारी फिर मुझे न सताती॥