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तपती दुपहरी में

हरिहर सिंह चौहान
इन्दौर (मध्यप्रदेश )
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जेठ वैशाख का वह ‘प्रखर’ समय,
जब ‘सूरज’ सिर के ऊपर आए
चिलचिलाती ‘धूप’ में गर्म हवाएं भी लाए,
तो लोग पूछते हैं,-कैसा लगता है इस तपती दुपहरी में…?

तलाशता है मन ‘छाया’ व सुकून के वह पल,
शीतलता की प्यास में ठंडा-सा जल
तृप्ति के लिए इन ‘गर्म’ दिनों में भी निकलता तो हूँ मैं,
लोग पूछते हैं,-कैसा लगता है इस तपती दुपहरी में…?

प्रकृति भी बता देती है अपना ‘महत्व’ इन दिनों में,
इस सन्नाटे में तेज धूप का ‘कहर’ पेड़-पौधों व जलाशयों पर भी पड़ता है
लेकिन जीवन का हर पल जो रुकता नही है,वह इन दिनों सुकून चाहता है,
क्योंकि लोग पूछते हैं,-कैसा लगता है इस तपती दुपहरी में…?

धरती इन दिनों आग का गोला बन जाती है,
गर्म हवाएं लू भी ले आती है।
पर जीवन में हर किसी को चलना ही होता है,
हम तो चलते ही हैं,
पर लोग पूछते हैं,-कैसा लगता है इस तपती दुपहरी में…??