पद्मा अग्रवाल
बैंगलोर (कर्नाटक)
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अब्राहम लिंकन ने कहा था कि “पुस्तकें आदमी को यह बताने के काम में आती हैं कि उनके ये मूल विचार इतने भी नये नहीं हैं।”
यह सच भी है कि किताबों से गुजरना श्रेष्ठ अनुभवों से गुजरने जैसा है। किताबें पढ़ने से बड़ा सुख शायद ही कोई हो। इसी लिए पुस्तकों यानी किताबों को सबसे अच्छा दोस्त कहा गया है-
किताबें करती हैं बातें
बीते जमाने की,
दुनिया की, इंसानों की
आज की, कल की,
एक-एक पल की
खुशियों की गम की।
एक वो समय था, जब लोगों के घरों में भाई-बहनों में पत्रिकाएं पहले पढ़ने की होड़ हुआ करती थी। पिता की सुबह, दैनिक समाचार-पत्र पढ़ कर हुआ करती थी। घरों की अल्मारी में प्रतिष्ठित साहित्यकारों की किताबें उनकी रुचि के अनुसार सजी होतीं थीं, लेकिन दुर्भाग्य कि आजकल घरों में पत्रिकाओं की क्या कहें, दैनिक समाचार-पत्र भी आने बंद हो गए हैं, क्योंकि आज सबके हाथ में पुस्तकों जगह स्मार्टफोन ने ले ली है। पुस्तकालय की जगह सोशल मीडिया ने ले ली है।
विज्ञान और तकनीक ने जीवन को आसान एवं तेज बना दिया है।
मोबाइल फोन में हजारों पुस्तक संग्रहित की जा सकती हैं। ऑडियोबुक, ई-बुक और डिजिटल लाइब्रेरी ने ज्ञान को सुलभ तो बना दिया है, परंतु समस्या यह उत्पन्न हो गई है कि अब अधिकांश लोग गहराई से पढ़ने की बजाय तेजी से जानकारी प्राप्त करने के आदी हो गए हैं। हम बहुत कुछ पढ़ तो रहे हैं, परंतु आत्मसात कम कर रहे हैं। हम पढ़ तो बहुत रहे हैं, लेकिन समझ कम रहे हैं।
यह प्रश्न केवल पुस्तकों का नहीं है, वरन् हमारी पढ़ने की संस्कृति और ज्ञान की परंपरा का तार मुख्यरूप से बौद्धिक विकास से जुड़ा हुआ है।
वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए किसी ने सही कहा है –
कागज की ये महक, ये नशा रूठने को है,
किताबों से इश्क करने की ये आखिरी सदी है।
आज भी एक गंभीर पाठक हार्डकॉपी पुस्तक को ज्यादा महत्व देता है। पुस्तकों की खुशबू और पन्नों को पलट कर पढ़ने का जो सुख और आनंद है, वह भला मोबाइल और लैपटॉप पर कहाँ ?
आजकल ये बात बार-बार कही जाती है, कि युवा पुस्तकों को नहीं पढ़ रहे हैं। सच तो यह है, कि युवा ई बुक सहित ऑनलाइन लेख पढ़ते हैं और डिजिटल मंचों से साहित्य से जुड़ते हैं।
समस्या यह है, कि युवाओं का ध्यान अनेक विधाओं में बँट गया है।उन्हें पढ़ने के लिए जिस एकाग्रता की आवश्यकता होती है, वह लगातार नोटिफिकेशन और डिजिटल विचलन के कारण प्रभावित होती है। इसलिए चुनौती पुस्तकों की नहीं, वरन् एकाग्रता की है।
संक्षिप्त सामग्री पढ़ने की आदत के कारण लोगों में धैर्य कम हो गया है। आज लोग १ मिनट में इतिहास, २ मिनट में दर्शनशास्त्र तो ५ मिनट में पूरी पुस्तक सरसरी निगाह से देख कर ‘पढ़ लिया’ समझने लगते हैं।
यह प्रवृत्त्ति अध्ययन की संस्कृति और गरिमा को कमजोर कर रही है।
पुस्तकें और इंटरनेट में बहुत बड़ा अंतर है। इंटरनेट हमें हमारी जिज्ञासाओं का उत्तर देता है, जबकि किताबें प्रश्न करना सिखाती हैं। मोबाइल पर हम जानकारी खोजते हैं, लेकिन पुस्तकों में विचारों की यात्रा करते हैं।
एक अच्छी किताब केवल तथ्यों का संग्रह ही नहीं होती, वह लेखकों के अनुभव, मनन और चिंतन और उसके शोध का सार होती है। पाठक धीरे-धीरे विषय के अंदर प्रवेश करता है और उस पर चिंतन मनन करता है।
भविष्य में डिजिटल पुस्तकें अधिक लोकप्रिय हो सकती है, परंतु माध्यम बदलने से समाप्त नहीं हो जाएंगीं। जैसे रेडियो के आने से अखबार समाप्त नहीं हुए, टेलीविज़न के आने से रेडियो समाप्त नहीं हुआ और इंटरनेट के आने से टेलीविजन नहीं बंद हुआ। उसी प्रकार डिजिटल तकनीक के आने से किताब समाप्त नहीं होंगीं। उनका रूप बदलता रहेगा वो विकसित होती रहेंगीं तथा अपने नए रूपों में हमारे साथ बनी रहेंगीं।