डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’
बेंगलुरु (कर्नाटक)
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साहित्य समाज का दर्पण ही नहीं, उसका मार्गदर्शक भी होता है। लेखक केवल शब्दों का शिल्पी नहीं, बल्कि युग-चेतना का संवाहक, संस्कृति का संरक्षक और मानवीय मूल्यों का प्रहरी होता है। इसलिए लेखकों का कर्म और धर्म सामान्य व्यक्ति की अपेक्षा अधिक उत्तरदायित्वपूर्ण माना जाता है।
लेखक का प्रथम कर्म सत्य का उद्घाटन करना है। वह समाज में व्याप्त विसंगतियों, अन्याय, शोषण और अंधविश्वासों को उजागर करता है तथा जनमानस को जागरूक बनाने का प्रयास करता है। साहित्यकार की लेखनी केवल मनोरंजन का साधन नहीं होती, बल्कि वह विचारों की मशाल बनकर समाज को नई दिशा देती है। इतिहास साक्षी है, कि अनेक लेखकों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन और राष्ट्रीय जागरण का कार्य किया है। उनकी लेखनी ने सोई हुई चेतना को जगाया और जन-जन में आत्मसम्मान का भाव उत्पन्न किया।
लेखक का दूसरा महत्वपूर्ण कर्म मानवीय संवेदनाओं का संरक्षण और संवर्धन करना है। आज के भौतिकवादी युग में जहाँ स्वार्थ, प्रतिस्पर्धा और संवेदनहीनता बढ़ रही है, वहाँ साहित्य मनुष्य को मनुष्य बने रहने की प्रेरणा देता है। लेखक प्रेम, करुणा, दया, सहिष्णुता, त्याग और परोपकार जैसे मानवीय मूल्यों को अपनी रचनाओं में स्थान देकर समाज को नैतिक आधार प्रदान करता है।
जहाँ तक लेखक के धर्म का प्रश्न है, उसका धर्म निष्पक्षता, सत्यनिष्ठा और लोकमंगल है। लेखक को किसी संकीर्ण विचारधारा, जाति, वर्ग या स्वार्थ का पक्षधर बनने के बजाय व्यापक मानवता के हित को सर्वोपरि रखना चाहिए। उसकी लेखनी समाज को जोड़ने वाली हो, तोड़ने वाली नहीं। वह जनभावनाओं का सम्मान करते हुए विवेकपूर्ण दृष्टि से यथार्थ का चित्रण करे। लेखक का धर्म है, कि वह अपनी रचनाओं में संस्कृति, सभ्यता और नैतिक मूल्यों का संरक्षण करे तथा नई पीढ़ी को सकारात्मक दिशा प्रदान करे।
लेखक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है, किन्तु उसके साथ सामाजिक उत्तरदायित्व भी जुड़ा हुआ है। साहित्य का उद्देश्य केवल लोकप्रियता प्राप्त करना या विवाद उत्पन्न करना नहीं, बल्कि समाज के बौद्धिक और नैतिक विकास में योगदान देना है। एक सच्चा लेखक अपने शब्दों की शक्ति को समझता है और उनका उपयोग मानव कल्याण के लिए करता है।
वर्तमान समय में जब सूचना और संचार के अनेक माध्यम उपलब्ध हैं, लेखक की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो गई है। उसे सत्य, विवेक और संवेदना के साथ समाज का मार्गदर्शन करना चाहिए। उसकी लेखनी राष्ट्र निर्माण, सांस्कृतिक संरक्षण और मानवता की प्रतिष्ठा का सशक्त माध्यम बन सकती है।
अतः, कहा जा सकता है कि लेखक का कर्म सृजन करना है और उसका धर्म लोकमंगल। जब लेखक सत्य, संवेदना और नैतिकता के मार्ग पर चलकर सृजन करता है, तब उसका साहित्य कालजयी बन जाता है और समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत बनता है। यही लेखक के कर्म और धर्म की वास्तविक सार्थकता है।
परिचय-डॉ.राम कुमार झा का साहित्यिक उपनाम ‘निकुंज’ है। १४ जुलाई १९६६ को दरभंगा में जन्मे डॉ. झा का वर्तमान निवास बेंगलुरु (कर्नाटक)में,जबकि स्थाई पता-दिल्ली स्थित एन.सी.आर.(गाज़ियाबाद)है। हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी,मैथिली,बंगला, नेपाली,असमिया,भोजपुरी एवं डोगरी आदि भाषाओं का ज्ञान रखने वाले श्री झा का संबंध शहर लोनी(गाजि़याबाद उत्तर प्रदेश)से है। शिक्षा एम.ए.(हिन्दी, संस्कृत,इतिहास),बी.एड.,एल.एल.बी., पीएच-डी. और जे.आर.एफ. है। आपका कार्यक्षेत्र-वरिष्ठ अध्यापक (मल्लेश्वरम्,बेंगलूरु) का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप हिंंदी भाषा के प्रसार-प्रचार में ५० से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़कर सक्रिय हैं। लेखन विधा-मुक्तक,छन्दबद्ध काव्य,कथा,गीत,लेख ,ग़ज़ल और समालोचना है। प्रकाशन में डॉ.झा के खाते में काव्य संग्रह,दोहा मुक्तावली,कराहती संवेदनाएँ(शीघ्र ही)प्रस्तावित हैं,तो संस्कृत में महाभारते अंतर्राष्ट्रीय-सम्बन्धः कूटनीतिश्च(समालोचनात्मक ग्रन्थ) एवं सूक्ति-नवनीतम् भी आने वाली है। विभिन्न अखबारों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हैं। विशेष उपलब्धि-साहित्यिक संस्था का व्यवस्थापक सदस्य,मानद कवि से अलंकृत और एक संस्था का पूर्व महासचिव होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी साहित्य का विशेषकर अहिन्दी भाषा भाषियों में लेखन माध्यम से प्रचार-प्रसार सह सेवा करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ है। प्रेरणा पुंज- वैयाकरण झा(सह कवि स्व.पं. शिवशंकर झा)और डॉ.भगवतीचरण मिश्र है। आपकी विशेषज्ञता दोहा लेखन,मुक्तक काव्य और समालोचन सह रंगकर्मी की है। देश और हिन्दी भाषा के प्रति आपके विचार(दोहा)-
स्वभाषा सम्मान बढ़े,देश-भक्ति अभिमान।
जिसने दी है जिंदगी,बढ़ा शान दूँ जान॥
ऋण चुका मैं धन्य बनूँ,जो दी भाषा ज्ञान।
हिन्दी मेरी रूह है,जो भारत पहचान॥