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भयंकर जानवर

कुमारी ऋतंभरा
मुजफ्फरपुर (बिहार)
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किसी छोटे-से गाँव में एक परिवार रहता था। ना वो परिवार गरीब था, ना ही बहुत ज़्यादा अमीर। परिवार में २ बुजुर्ग और एक बेटा उसकी पत्नी और ३ मासूम बेटियां थी। घर में रोज़ के ताने-उलाहने, गाली-गलौज होती। दिनभर सुफिया घर का काम करती, पर जब खाना खाने जाती, तब उसे कुछ नसीब नहीं होता। कभी-कभी पेट की आग बुझाने के लिए घर के पिछवाड़े बाली झोपड़ी में जो बकरी पाल रखी थी, उसी का दूध निकाल कर चुपके से पी लेती थी। भूख मिटाने से ज्यादा एक माँ को और अपने दूध मुंहे बच्चे की चिंता होती है, जो उसके गोद में २ महीने का था। झोपड़ी में बची-खुची रोटी खाती थी उसी का टुकड़ा निकालकर चुपके से वो ले जाती थी। सूखा निवाला उसके मुँह में जाता भी नहीं था। बेचारी की आँखों में आँसू होते थे, जो बहकर गालों पर आ ही जाते।
   सुफिया के सास-ससुर उसे देखना नहीं चाहते थे, क्योंकि सुफिया का कोई बेटा नहीं था। बस इतनी-सी कमी रह गई थी। सास-ससुर कभी भी उसके गुण नहीं देखते। वो अपने सास-ससुर को कभी भी ‘माँ-पिता’ नहीं कह पाई। पति भी कहता था, “वंश चाहिए।” सुफिया कहती, “मैं क्या करूँ ?, मेरा शरीर इतना स्वस्थ नहीं रहा कि मैं और संतान पैदा करूँ।”
     लोग कहते हैं किसी जानवर को पालो तो उससे भी प्यार हो जाता है, पर इन अपनों को सुफिया पे कभी तरस न आया। एक दिन सभी में बड़ा झगड़ा हुआ, फिर सबने मिलकर सुफिया को घर से निकाल दिया। वह बेचारी ३ बेटियों को लेकर बारिश में भीगते हुए एक पेड़ के नीचे रात काटने लगी, तभी ज़ोर से बिजली गिरी और उससे सुफिया की गोद का एक छोटा बच्चा मर गया। उसे लेकर सुफिया कब्रिस्तान पर गई। वहाँ के मौलाना ने कहा, “बाप को बुलाओ”। फिर वह श्मशान घाट की तरफ चल दी, पर किसी पंडित ने कहा, “बाप आएगा, तभी तो दाह संस्कार होगा। न जाने किसका पाप ढोकर घूम रही है।”
    तभी सुफिया ने आँसू पीकर और मिट्टी खोदकर मरे हुए बेटे को दफना दिया और कलेजा मज़बूत कर चल दी। अकेली कहाँ जाती ?, २ बेटियाँ उसके साथ थीं। चलते-चलते वह स्टेशन पहुँच गई। वहीं अपनी बेटियों के लिए भीख मांगी और फिर उसी ट्रेन में चढ़ गई। एक महिला बोली, “बेटी कलेजा मज़बूत करो, २ दिन ही तो यह दुःख है। तुम भी चलो, बड़ा शहर है, कहीं काम करके क्या दो रोटी नहीं कमा सकती है ?”
सुनकर सुफिया को जैसे हिम्मत आ गई। वही बूढ़ी महिला, जो उसके लिए फरिश्ता बनकर आई थी, ने  उसे किसी प्लास्टिक की फैक्ट्री में छोटा-मोटे काम पर रखवा दिया। इसी बीच सुफिया एक-दो घरों में भी बर्तन कर लेती और फैक्टरी में नाइट ड्यूटी भी कर लेती थी। सुफिया ने वहीं पर एक छोटा-सा कमरा किराए पर ले लिया। दोनों बेटी सरकारी विद्यालय में पढ़ने लगीं और फिर धीरे-धीरे हँसी-खुशी रहने लगीं। सब खुश थे, पर बच्चे सपने देखने लगे कि मैं डॉ. बनूँगी…। दूसरी बेटी ने कहा, “माँ, मैं इंजीनियर बनूँगी।”
सबसे छोटी कुछ बोल नहीं पा रही थी, बस मुस्कुरा रही थी।
   सच ही कहते थे पहले के लोग- मुसीबत गरीब पर ही आती है।
एक रात… सुफिया नाइट ड्यूटी से घर लौट रही थी। तेज बारिश हो रही थी, काली रात और भी भयानक लग रही थी, पर सुफिया को तो बस अपने भूखे बच्चे दिख रहे थे। २ रुपए बचाने के लिए वो बस नहीं लेती थी, इसलिए पैदल ही तेज कदमों से घर की ओर जा रही थी।
तभी सड़क किनारे एक बड़ी बस ने उसके साथ बहुत बुरा किया। उसके साथ हिंसा और अत्याचार हुआ। फिर उसे सड़क पर छोड़ दिया गया।
बारिश में बेहोश पड़ी सुफिया को जब होश आया, तो उसने खुद को अस्पताल के बिस्तर पर पाया।
वो चीख पड़ी, “मुझे मेरे बच्चों के पास जाना है, उन्हें खाना देना है!”
डॉक्टर ने धीरे से कहा, “आपके शरीर पर बहुत जख्म हैं। अभी आप घर नहीं जा सकतीं। पुलिस आपसे बात करना चाहती है।”
  सुफिया की आँखों से आँसू बह रहे थे, पर उसके मन में सिर्फ एक ही बात थी- मेरी बेटियाँ।
इस रात ने सुफिया का शरीर तोड़ा, पर उसकी ममता और हिम्मत को नहीं।
इधर, पुलिस की पूछताछ में सुफिया कुछ न बोल सकी और बेहोश हो गई। डॉक्टर साहब पुलिस से कह रहे थे- “इतनी बड़ी दुनिया में हम भूत से भी नहीं डरते। जंगल के जानवर भी हमें देखकर छुप जाते हैं, पर कुछ दरिंदे इंसान खुलेआम घूम रहे हैं। लोग अपनी बच्चियों को उनसे बचाकर रखते हैं। कब तक ?
धरती के ये भयंकर जानवर ३ साल की मासूम बच्चियों को भी नहीं छोड़ते। कोई प्रेम का झांसा देकर, कोई अपहरण करके, कोई कामकाजी महिलाओं को… ये लोग सोचते ही नहीं कि इनके घर में भी तो माँ-बहन हैं।”
   ये सब बातें सुफिया के कानों तक पहुँच रही थीं। वो सोच रही थी- “हम औरतों को न घर में शरण मिलती है, न दुनिया में चैन से जीने देते हैं। गर्व से सिर उठाकर चल भी नहीं सकते। बेटी को अकेला छोड़ो तो डर लगता है, कब कौन भेड़िए के भेष में हमला कर दे। इतनी बड़ी दुनिया में कहाँ जाएँ, भगवान ?”
  जब सुफिया अस्पताल से घर आई, तो मोहल्ले के लोग मिलने आते-जाते रहे, पर सुफिया किसी से नज़रें नहीं मिला पाती थी। एक रात रोते-रोते सुफिया बेटी से बोली,- “बेटा, मेरा शरीर अपवित्र हो गया है। अब मैं जीना नहीं चाहती।”
रो-रोकर उसका बुरा हाल था। जैसे जीवन ही खत्म हो गया हो। न हँसती, न खुशी से खाती। बस दरवाजे की तरफ देखती रहती।
अब उसे कौन समझाए… जो मन से टूट गई हो, वो बारिश के बुलबुले की तरह होती है – आते ही फूट जाती है। सुफिया भी कुछ ऐसी ही हो गई थी।
  एक दिन सुफिया सो रही थी।उसकी बेटी पास बैठकर उसका हाथ सहलाने लगी और बोली
“माँ, आपके साथ शारीरिक और मानसिक आघात हुआ है, पर आपको हार नहीं माननी है। आपको उठना होगा। मेरे लिए, मेरी बहनों के लिए, और उन लोगों से बदला लेने के लिए जिन्होंने ये किया। इज्जत शरीर में नहीं, इरादे में होती है माँ। आपने हिम्मत करके मुझे बचाया था। अब मैं और मेरी बहन आपको बचाएंगे।”
बेटी ने माँ का हाथ थामकर कहा,-
“माँ, अब आपको संभलना होगा। समय पर खाना खाइए और स्वस्थ रहिए। आपका स्वस्थ होना ही हमारे लिए सबसे बड़ी दौलत है।”
घर में जो थोड़ा-बहुत सामान था, उसी से जीवन चलने लगा।कभी-कभी मोहल्ले के लोग भी मदद को आ जाते। इसी बीच पुलिस का आना-जाना लगा रहा। दरोगा जी बड़े नेक दिल इंसान थे। उन्होंने समझाया,-“सुफिया, समय पर दवा लो और कोई काम शुरू करो। खाली बैठने से घाव और गहरे होते हैं।”
  चरित्र कितना भी पवित्र हो, लोगों की नजरें फिर भी तिरछी ही रहती हैं। इसलिए पहले जो महिलाएं रोटी लेकर आती थीं, अब उन्होंने भी आना बंद कर दिया।
अब ‘कोर्ट की तारीख’ आ गई। सुफिया को कचहरी के चक्कर काटने पड़े। फिर भी दरोगा जी बड़े भाई की तरह साथ खड़े रहे।
एक सुबह सुफिया सूरज की पहली किरण के साथ उठी। स्नान-पूजा की और थाने पहुंचकर हाथ जोड़कर बोली,”बाबूजी, मुझे इस केस और कोर्ट-कचहरी से मुक्ति दिला दीजिए।”
  दरोगा जी ने केस बंद करवाया और पूछा,-“अब क्या करोगी बहन…?”_
सुफिया ने आँखों में हौसला भरकर कहा, “फैक्ट्री में काम करूंगी।”
सुफिया फैक्ट्री गई, तो रास्ते में लोगों ने मुँह फेर लिया। मैनेजर के पास जाकर बोली-“साहब, झाड़ू-पोंछा का काम दे दीजिए। बस दो वक्त की रोटी मिल जाए।”
  मैनेजर ताने मारकर बोला,- “तुम्हारा चरित्र कहाँ रहा ? तुम ‘अपवित्र’ हो गई हो। हर किसी को सफाई देती फिरोगी ? मेरी फैक्ट्री में जगह नहीं है।”
तब भी सुफिया का हौसला नहीं टूटा। वह एक से दूसरी फैक्ट्री गई, पर हर जगह उसे मिलीं – गंदी नजरें, कटाक्ष और ताने। फिर भी सुफिया रुकी नहीं… क्योंकि उसे पता था- इज्जत शरीर में नहीं, इरादे में होती है
दिन भर भटकते-भटकते थककर सुफिया सांझ के समय घर लौटी।
आसमान में तारे टिमटिमा रहे थे। दरवाजा खुलते ही तीनों बेटियां दौड़कर आईं। एक ने पानी दिया, दूसरी ने बिस्किट। और तीनों माँ के गले से ऐसे लिपट गईं, जैसे बरसों बाद मिली हों।
महानगर की चमक-दमक का कोई रूआब सुफिया के दिल को नहीं छू सका। उसके लिए दुनिया अब सिर्फ उसकी बेटियां थीं।
  अगले दिन सुफिया फिर उठी।
हिम्मत बांधकर दरोगा जी के घर पहुंची। हाथ जोड़ कर बोली,
मालिक, बेटियों के पेट और पढ़ाई के लिए कुछ करना है। उनका भविष्य संवारना है। अकेली होती तो कहीं भी दिन काट लेती।
तभी अंदर से दरोगा जी की पत्नी निकलीं। स्नेह से बोलीं
“बेटी, जिंदगी में ऊँच-नीच आती रहती है। ये तकदीर का खेल है। तुम अच्छी महिला हो। आज से मेरे घर के काम में हाथ बँटा दो। मैं बीमार रहती हूँ, शरीर साथ नहीं देता।”
सुफिया की आँखें भर आईं। वो मेम साहब के पैरों पर गिर पड़ी,- “आप मेरे लिए देवी हैं, भगवान हैं।”
बस फिर क्या था…
  सुफिया ने ईमानदारी से झाड़ू-पोंछा, बर्तन, सब काम संभाल लिया। मेम साहब ने दया करके पिछवाड़े का एक छोटा कमरा भी दे दिया। सुफिया अब अपनी तीनों बेटियों के साथ उसी में रहने लगी।
  दरोगा जी की पत्नी सुफिया की मेहनत और सहनशीलता से बहुत खुश थीं। उन्होंने दरोगा जी से कहकर पास के सरकारी विद्यालय में तीनों बेटियों का नाम भी लिखवा दिया।
  सुफिया की बेटियां न सिर्फ सुंदर थीं, बल्कि पढ़ाई में भी तेज थीं।
घर का काम निपटाकर रात में सुफिया थोड़ा समय निकालकर लोगों के कपड़े भी सिलती। उससे दो वक्त की रोटी और अच्छे से चलने लगी।
अब सुफिया ने सीख लिया था,
“दु:ख, आंधी की तरह आते हैं, और हिम्मत की हवा बनकर उड़ भी जाते हैं। जिसने दुख को गले लगाकर उड़ान भर ली, उसकी जीत तय है।
   समय बीतता गया। पीछे छूटते हुए संघर्ष के दिनों के साथ सुफिया की बेटियां भी जवान हो गईं। ईश्वर की कृपा से दरोगा जी का परिवार बहुत अच्छा था। दरोगा जी का हाथ हमेशा सुफिया की बेटियों के सिर पर रहा। समाज में भी दरोगा जी का रुतबा था, इसलिए किसी की गंदी नजर सुफिया की बेटियों पर नहीं पड़ी।
   समय के साथ वो दिन भी आया, जब सुफिया की २ बेटियां पढ़ाई के लिए बाहर जाना चाहती थीं। एक मेडिकल और दूसरी इंजीनियरिंग पढ़ना चाहती थी। पैसे की दिक्कत थी, पर सरकारी कॉलेज में दाखिला हो गया। इसलिए खर्च ज्यादा नहीं था।
   इसी बीच उम्र और बीमारी ने दरोगा जी को भी जकड़ लिया। एक दिन दरोगा जी का देहांत हो गया।
दरोगा जी के जाने के बाद भी उनकी पत्नी सुफिया के साथ खड़ी रहीं। सुफिया रोज बीवी जी के पैर दबाती, गठिया की दवा देती, पोते-पोतियों को संभालती। उन्हें तेल लगाना, घुमाने ले जाना-सब करती।
जब भी सुफिया की बेटियों को पैसे की जरूरत होती, दरोगा जी का बेटा मदद कर देता।
आख़िरकार समय बदला… सुफिया की छोटी बेटी को एक कंपनी में अच्छी नौकरी मिल गई। वो अब अच्छा पैसा कमाने लगी। बड़ी बेटी मेडिकल की पढ़ाई कर रही थी। उसमें समय और पैसा दोनों ज्यादा लगते थे। छोटी बहन ने काम करके दोनों बहनों का खर्च संभाल लिया।
   समय के साथ तीनों बेटियां पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़ी हो गईं। सबने अपने क्षेत्र में अच्छे लड़के पसंद कर लिए। शादी की बात आई तो सुफिया ने दरोगा जी की पत्नी से हाथ जोड़कर कहा -“बीवी जी, आप ही कन्यादान कर दीजिए। ये सब आपके और भाई साहब की कृपा से हुआ है।”
  बीवी जी की आँखें भर आईं। बोलीं, “नहीं सुफिया, ये तुम्हारी मेहनत और हौसले का फल है। तुमने हार नहीं मानी।”
  बीवी जी ने ये बात अपने बेटे-बहू से कही। सब एक स्वर में बोले,
“हाँ माँ, सुफिया बुआ ने पूरा जीवन हमारी सेवा में बिता दिया। अब हम उनका कन्यादान करेंगे।”
और उस दिन सुफिया की तीनों बेटियों की शादी दरोगा जी के परिवार ने धूमधाम से की।
  घर में अंत में बच गए तो सिर्फ बीबी जी, सुफिया और दरोगा जी के बेटे का परिवार। सुफिया का जीवन संवेदनाओं से भरा था। उसके लिए कर्तव्य ही सबसे बड़ी पूजा थी और स्नेह ही सबसे बड़ा दिवस। उसके कारण जीवन की हर संध्या स्वर्णिम आभा से अलौकिक हो जाती थी।
उसने कभी स्वार्थ नहीं किया। रिश्तों के दर्पण पर कभी धूल नहीं जमने दी, न कभी लालच किया। अपनत्व का संगीत हमेशा उसके मन में जलता रहा।
सुफिया के आत्मबल की नींव इतनी मजबूत थी, कि जीवन की संध्या बेला में भी वह किसी के सहारे की मोहताज नहीं थी। फिर भी वह बीबी जी के चरणों में पड़ी रहती, क्योंकि सम्मान उसके संस्कार में था।
  सुफिया की इसी ईमानदारी ने सबके दिलों में जगह बना ली थी। उसका निर्मल मन, सच्चाई और ईमानदारी ही जीवन की सबसे सशक्त बैसाखी थी, जो हर मोड़ पर उसे गिरने से बचाती थी।
कबीर दास जी का एक दोहा याद आता है –
प्रीत करो तो ऐसी करो, जैसे करे कपास।
जीते जी तन ढके, मरे न छोड़े साथ॥
   सुफिया ने भी अपना पूरा जीवन अपने भाई समान दरोगा जी के परिवार को समर्पित कर दिया। सबने उसके व्यवहार के कारण उसका साथ दिया।
  आज समाज में सुफिया का अपना सम्मानित स्थान है। सामाजिक प्रतिष्ठा और स्वाभिमान के साथ जीने की चाह ही उसकी सबसे बड़ी पहचान है। सुफिया का सारा जीवन बीबी जी की सेवा करते-करते सार्थक हो गया। अर्थात – स्त्री यदि मन से मजबूत रहे, तो जीवन की हर लड़ाई लड़ सकती है।
लोगों ने सुफिया को तोड़ा बहुत, पर उसकी शिक्षा और ईमानदारी से जीने की चाह को उसके मन से कोई निकाल नहीं पाया।
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