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समझना होगा स्वतंत्रता का सही अर्थ

नीलम प्रभा सिन्हा
धनबाद (झारखंड)
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“हिमाद्रि तुंग श्रृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती,
स्वयं प्रभा समुज्ज्वला, स्वतंत्रता पुकारती।”

     इन अमर पंक्तियों के रचयिता राष्ट्रकवि जयशंकर प्रसाद हैं। यह प्रसिद्ध पंक्ति हमें बताती है कि भारतवर्ष के लिए स्वतंत्रता कितनी महत्त्वपूर्ण है। प्रत्येक व्यक्ति और प्रत्येक राष्ट्र स्वतंत्र रहना चाहता है। जो भी परतंत्र होता है, वह बंधनों से मुक्त होने की आकांक्षा रखता है, किंतु केवल स्वतंत्र कहलाना ही पर्याप्त नहीं है। वास्तविक स्वतंत्रता का अर्थ है-निरंतर प्रगति करना, आत्मनिर्भर बनना और अपनी क्षमता का पूर्ण विकास करना।
   स्वतंत्रता का सही अर्थ है— अपनी इच्छा और विवेक के अनुसार कार्य करने तथा निर्भय होकर जीवन जीने का अधिकार। यह प्रत्येक व्यक्ति और प्रत्येक राष्ट्र को अपनी नियति स्वयं निर्धारित करने की शक्ति प्रदान करती है। अपने निर्णय लेने में किसी प्रकार की बाधा न हो तथा किसी तीसरे पक्ष की अनावश्यक दखलअंदाजी न हो। किसी प्रकार का भय, दबाव या बंधन व्यक्ति की प्रतिभा और क्षमताओं के विकास में बाधक बनता है। इसलिए, अपने मन और विवेक से स्वतंत्र रूप से जीने का अधिकार ही वास्तविक स्वतंत्रता है, किन्तु स्वतंत्रता का अर्थ स्वच्छंदता या मनमानी नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्तव्यों का भी पालन करना चाहिए। जिस प्रकार हमें स्वतंत्रता प्राप्त है, उसी प्रकार दूसरों को भी समान अधिकार प्राप्त हैं। इसलिए, हमें अपने अधिकारों का प्रयोग इस प्रकार करना चाहिए कि किसी अन्य व्यक्ति के अधिकारों का हनन न हो। हमें स्वतंत्र होते हुए भी किसी दूसरे व्यक्ति को हानि पहुँचाने का प्रयास नहीं करना चाहिए। स्वतंत्रता तभी सार्थक है, जब वह मर्यादा, अनुशासन और उत्तरदायित्व के साथ जुड़ी हो।
स्वतंत्रता किसी व्यक्ति को किसी अन्य व्यक्ति या किसी वस्तु पर अनुचित अधिकार जमाने की अनुमति नहीं देती। प्रत्येक व्यक्ति की अपनी स्वतंत्र पहचान, गरिमा और सम्मान है। प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह देशहित को सर्वोपरि रखते हुए अपने सामाजिक एवं राष्ट्रीय दायित्वों का पालन करे। स्वतंत्रता तभी सफल और सार्थक सिद्ध होती है, जब उसका लाभ केवल स्वयं तक सीमित न रहकर समाज और राष्ट्र के कल्याण में भी सहायक बने।
  राजनीतिक स्वतंत्रता का अर्थ है कि प्रत्येक नागरिक को अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करने, अपने विचार स्वतंत्र रूप से व्यक्त करने तथा शासन की नीतियों में भागीदारी करने का अधिकार प्राप्त हो। लोकतंत्र की सफलता तभी संभव है, जब नागरिक अपने अधिकारों का विवेकपूर्ण उपयोग करें और संविधान द्वारा निर्धारित कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करें। एक जागरूक नागरिक ही स्वतंत्र राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति होता है।
  आर्थिक स्वतंत्रता का तात्पर्य है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी योग्यता और रुचि के अनुसार आजीविका चुनने तथा कार्य करने का समान अवसर प्राप्त हो। उसे आय अर्जित करने, व्यवसाय करने और संपत्ति रखने का अधिकार हो। आर्थिक संसाधनों पर किसी एक वर्ग या व्यक्ति का एकाधिकार नहीं होना चाहिए। यदि समाज में आर्थिक अवसर समान रूप से उपलब्ध नहीं होंगे, तो असमानता बढ़ेगी और अनेक लोग अपनी प्रतिभा का पूर्ण उपयोग नहीं कर पाएँगे। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने का अवसर मिलना चाहिए।
   सामाजिक स्वतंत्रता का अर्थ है कि समाज में प्रत्येक व्यक्ति को जाति, धर्म, भाषा, लिंग अथवा आर्थिक स्थिति के आधार पर किसी प्रकार के भेदभाव का सामना न करना पड़े। सभी नागरिकों को समान सम्मान, समान अवसर और समान अधिकार प्राप्त हों। जब समाज में समानता, बंधुत्व और पारस्परिक सम्मान की भावना विकसित होती है, तभी स्वतंत्रता का वास्तविक स्वरूप दिखाई देता है।
   अतः प्रत्येक व्यक्ति को स्वतंत्रता प्राप्त होनी चाहिए। उसे अपनी योग्यता और क्षमता के अनुरूप कार्य का अवसर मिलना चाहिए। जब व्यक्ति अपनी पसंद का कार्य करता है, तो उसकी कार्यक्षमता भी बढ़ जाती है। उसके भीतर अपने कार्य के प्रति लगन, उत्साह और समर्पण की भावना जागृत होती है। परिणामस्वरूप वह जी-तोड़ मेहनत करके अपने कार्य को अधिक कुशलता, निष्ठा और उत्कृष्टता के साथ करता है। ऐसी स्वतंत्रता न केवल व्यक्ति के विकास का मार्ग प्रशस्त करती है, बल्कि समाज और राष्ट्र की उन्नति में भी महत्त्वपूर्ण योगदान देती है।
अंततः, स्वतंत्रता एक अमूल्य धरोहर है। यह हमें केवल अधिकार ही नहीं देती, बल्कि अनेक उत्तरदायित्व भी सौंपती है। प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह अपनी स्वतंत्रता का सदुपयोग करे, दूसरों की स्वतंत्रता का सम्मान करे तथा राष्ट्र के विकास में सक्रिय योगदान दे। जब हम अपने अधिकारों और कर्तव्यों के बीच संतुलन स्थापित करते हैं, तभी स्वतंत्रता का वास्तविक उद्देश्य पूर्ण होता है। ऐसी स्वतंत्रता ही व्यक्ति, समाज और राष्ट्र की उन्नति का आधार बनती है तथा लोकतंत्र को सशक्त, समृद्ध और स्थायी बनाती है।
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