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हिंदी भाषा की रक्षा और समृद्धि का जीवंत उदाहरण

संदीप ‘सृजन’
उज्जैन (मध्यप्रदेश)
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प्रसंगवश:कैलाशचंद्र पंत…

जब कोई महान व्यक्तित्व इस संसार से विदा होता है, तब केवल एक जीवन का अंत नहीं होता, बल्कि एक युग की स्मृतियाँ, एक विचारधारा की जीवंत परंपरा और एक सांस्कृतिक चेतना का विराट अध्याय इतिहास के पन्नों में दर्ज हो जाता है। पद्मश्री कैलाश चंद्र पंत का निधन हिंदी साहित्य, पत्रकारिता, भाषा आंदोलन और भारतीय सांस्कृतिक चेतना के लिए ऐसा ही क्षण है। उनके जाने से हिंदी जगत ने केवल एक साहित्यकार नहीं खोया, बल्कि ऐसा मार्गदर्शक खो दिया, जिसने अपना संपूर्ण जीवन हिंदी भाषा को राष्ट्र की आत्मा और समाज की संवेदना के रूप में प्रतिष्ठित करने में समर्पित कर दिया।
मध्य प्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के पूर्व संचालक, अंतरराष्ट्रीय स्तर के हिंदी सेवी, वरिष्ठ साहित्यकार, पत्रकार और शिक्षाविद् के रूप में उन्होंने अपना पूरा जीवन हिंदी भाषा, साहित्य, पत्रकारिता और सांस्कृतिक चेतना की सेवा में समर्पित कर दिया। लगभग ९ दशक का उनका जीवन तपस्या, समर्पण और निर्भीक पत्रकारिता का प्रतीक रहा।
मध्यप्रदेश के इंदौर जिले के महू में जन्में पंत जी का पैतृक गाँव उत्तराखंड के बागेश्वर जिले का खंतोली है। माता श्रीमती हरिप्रिया पंत और पिता स्व. लीलाधर पंत के संस्कारों ने उनके व्यक्तित्व को गढ़ा। प्राथमिक शिक्षा महू में पूरी करने के बाद उन्होंने इंदौर क्रिश्चियन कॉलेज से उपाधियाँ प्राप्त कीं। छात्र जीवन में ही वे स्काउटिंग, वाद-विवाद और सामाजिक कार्यों में सक्रिय रहे। कॉलेज पत्रिका का संपादन और हिंदी समिति का नेतृत्व उनके प्रारंभिक नेतृत्व गुणों का परिचय था।
  व्याख्याता की  सरकारी नौकरी के बावजूद हिंदी और साहित्य के प्रति उनका लगाव गहरा था। अंततः उन्होंने नौकरी छोड़कर स्वतंत्र पत्रकारिता और हिंदी सेवा का मार्ग चुना। यह निर्णय उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ था।पत्रकारिता में उनका योगदान उल्लेखनीय रहा। वे सोशलिस्ट कांग्रेसमैन (दिल्ली), नव प्रभात और नव भारत (भोपाल) से जुड़े। बाद में इंदौर से ‘दुर्गामी आवाज’ और २००३ से भोपाल से द्वैमासिक-मासिक ‘अक्षरा’ का संपादन किया। ‘अक्षरा’ के मुख्य संपादक के रूप में लगभग १८ वर्ष तक उन्होंने साहित्यिक प्रतिभाओं को मंच दिया। उनके लगभग ८०० लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए, जो साहित्यिक, सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर गहन चिंतन प्रस्तुत करते हैं।
   मध्य प्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति से उनका गहरा जुड़ाव रहा। नवंबर १९८८से सचिव और बाद में महामंत्री-संचालक के रूप में उन्होंने समिति को नया जीवन दिया। हिंदी भवन को विकसित किया। स्वास्थ्य कारणों से सेवानिवृत्त हुए, लेकिन हिंदी सेवा का उनका सिलसिला नहीं थमा।
उनके साहित्यिक कृतित्व में ‘कौन किसका आदमी’, ‘धुंध के आर-पार’ तथा ‘शैलेश मटियानी: सृजन यात्रा’ (संपादन) जैसी कृतियाँ शामिल हैं। उनकी लेखन शैली आलोचनात्मक, वैचारिक और समाजोपयोगी रही। वे मुख्य रूप से आलोचनात्मक निबंध लिखते थे।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उनका योगदान रहा। नौवें विश्व हिंदी सम्मेलन (जोहान्सबर्ग) में विश्व हिंदी सम्मान प्राप्त किया। भारत सरकार के प्रतिनिधि के रूप में फिलीपींस, नेपाल, इजराइल आदि देशों की यात्राएँ कीं। हिंदी को वैश्विक मंच पर मजबूती देने के उनके प्रयास सराहनीय हैं।
  उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता थी सादगी, निर्भीकता और निरंतरता। वे ‘दादा’ के नाम से जाने जाते थे। युवा रचनाकारों को प्रोत्साहित करना, संस्थानों का निर्माण करना और हिंदी को जन-जन तक पहुँचाना उनके जीवन का उद्देश्य था। वे कहते थे कि भारतीय लोग हिंदी में हस्ताक्षर करें—यह उनका वर्षों पुराना सपना था। 1995 में भोपाल में नागरिक अभिनंदन हुआ। विभिन्न सम्मानों में नेहरू साक्षरता पुरस्कार (पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के हाथों), साहित्य भूषण और हिंदी सेवी सम्मान शामिल है।
कैलाश चंद्र पंत दादा का जीवन हिंदी भाषा की रक्षा और समृद्धि का जीवंत उदाहरण है। उन्होंने सरकारी सुविधाओं का त्याग कर स्वतंत्र पथ चुना। संस्थानों का निर्माण कर हिंदी को मजबूत किया। पत्रकारिता के माध्यम से समाज में जागरूकता फैलाई। साहित्य के माध्यम से वैचारिक दृष्टि दी। शिक्षा के क्षेत्र में योगदान देकर नई पीढ़ी को संस्कारित किया। उनका व्यक्तित्व लोकसंग्रही था—वे सबको जोड़ने वाले थे। सादगी भरी जीवनशैली, गहन अध्ययन और निरंतर कर्म उनके गुण थे।
३१ जुलाई को वे महाप्रयाण यात्रा के लिए प्रस्थान कर चुके हैं, उनके जाने से मध्य प्रदेश ही नहीं; पूरे हिंदी जगत में शून्य उत्पन्न हो गया है। युवा साहित्यकार, पत्रकार और हिंदी सेवी उनके जीवन से सीख लें कि भाषा सेवा में समर्पण ही सच्ची सफलता है। पद्मश्री सम्मान उनके जीवन की साधना का राष्ट्रीय स्वीकृति था, लेकिन सच्चा सम्मान उनके कार्यों में निहित है। हिंदी जगत उनके ऋण से कभी उऋण नहीं हो सकता। विनम्र श्रद्धांजलि…।

(लेखक साहित्यकार, स्वतंत्र पत्रकार-संपादक एवं स्तम्भकार हैं)