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सफ़र में अकेले चलना

दीप्ति खरे
मंडला (मध्यप्रदेश)
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चल पड़ी हूँ जीवन की,
अनजान राहों पर अकेली।
पर कभी कभी ये सफ़र,
दिल को रुला जाता है।

जीवन की इन राहों पर,
भीड़ है चलने वालों की
पर भीड़ भरी इन राहों पर भी,
मन तन्हा रह जाता है।

साथ हो हमसफ़र लेकिन,
साथ का एहसास न हो।
बातें होती हों रोज मगर,
दिल की बातें दिल में रह जाती हों।

चलते-चलते इन राहों पर,
खुद से बातें कर लेती हूँ
टूटे हुए ख्वाबों को,
खुद ही जोड़ लेती हूँ।

कभी टूट कर रुक जाऊं तो,
आँसू साथ निभाते हैं
दिल के हौसले मुझे,
फिर से आगे बढ़ाते हैं।

शायद किसी मोड़ पर,
कोई अपना मिल जाएगा।
जीवन की इन राहों पर चलना,
कितना हसीन हो जाएगा॥