ममता सिंह
धनबाद (झारखंड)
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माँ, माँ तो होती है सर्वश्रेष्ठ रचनाकार,
माँ, माँ हमारी है सर्वश्रेष्ठ सलाहकार।
हमारी माँ से ही मिलता है हमें प्यार,
माँ से ही मिलता है अपार स्नेह, दुलार।
माँ ही उठाती नखरे हमारे दिन-रात,
माँ बिना नहीं होती हमारी औकात।
चोट लगे हमें दवा वो बन जाती है,
रोनी सूरत देख झट समझ जाती है।
हर समस्या का इलाज होता उसके पास,
बेझिझक हर बात हम बताते उसके साथ।
हमारे सुख-दु:ख का वो होती है साथी,
हम ऐसे रहते हैं जैसे दीया बिन बाती।
माँ बिना बचपन हमारा होता है अधूरा,
माँ ही हमारे सभी शौक करती है पूरा।
अगर उस माँ ने हमें जन्म ना दिया होता,
धरती पर हमारा कोई अस्तित्व ही ना होता।
उसने जन्म देकर हमारा किया बेड़ा पार,
यथासम्भव पाल-पोस, किया उसने तैयार।
ऐसा देखा है हमने बड़े होते ही वही बच्चे,
अब गिरगिट-सा रंग बदलते हैं, नहीं रहे सच्चे।
वही माँ अब बच्चों पर बोझ है बन जाती,
उनकी अब उन्हें जरूरत नहीं अवाक हो जाती।
माँ की जगह अब किसी और ने ले ली है,
माँ, माँ की जगह कुछ और पुकारी जाती है।
माँ की बात अब उन्हें अच्छी नहीं है लगती,
वह अनपढ़-नासमझ माँ सामाजिक नहीं लगती।
उसके घूमने-फिरने के दिन अब तो चले गए हैं,
कमरे में बंद कर बच्चे अब बाहर ताला लगा गए हैं।
पड़ोसी आए, ताला लटका देख वापस चले जाते हैं,
क्योंकि बच्चों को डर होता, घर की पोल खोल जाते हैं।
वही माँ एक कमरे में अब तो इंतज़ार है करती,
कोई तो बच्चे हमारे कमरे में आ जाते जल्दी।
शाम हुई, खुला दरवाजा जूते करते खट-खट।
दिल धक से धड़क जाता, कोई आए चट-पट।
अगले ही पल निराश माता, कमरे में कोई नहीं आता,
अपने पुराने दिन को याद कर चेहरे पर मुस्कान लाती।
यही प्रक्रिया अब तो यहाँ हर रोज है होती,
जाने कब तक समझे बच्चे, साँस अब अटकती।
माँ तो माँ ही होती है, अब भी उन्हें दुआएं देती हैं,
उनकी कोई करे शिकायत, झट वो लड़ जाती हैं।
बच्चों की आँखों में आँसू वो देख नहीं पाती है,
भले ही वही संतानें उनसे बदतमीजी कर जाती है।
माँ का जी है गाय, और पूत का जी है कसाय,
पुरानी कहावत है कोई भी इनसे बाज न आए।
बच्चे अपना फर्ज निभाए, चाहे कुछ भी हो जाए,
फर्ज से पीछे हटो नहीं, चाहे जग बैरी बन जाए॥