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मेरा प्रेम-तुम्हारा प्यार

डॉ. श्राबनी चक्रवर्ती
बिलासपुर (छतीसगढ़)
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मेरा प्रेम,
झरने की तरह
बहता हुआ
निर्मल, निश्छल
तन-मन को करता शीतल।

तुम्हारा प्यार,
रात की गहराई की तरह
गंभीर, समझ के बाहर,
कभी वो सार्थक उपहार
कभी दिमाग का दही।

मेरा प्रेम,
थोड़ी नोक-झोंक
कभी थोड़ा बचपना,
अच्छा खाना बनाना
अनुराग से खिलाना।

तुम्हारा प्यार,
विचित्र पर निराला
कभी कर्मयोगी निष्ठावान,
कभी बनारस का मीठा पान
कभी बिन बोले मेहमान।

मेरा प्रेम,
सुबह की लाली
जग से निराली,
कोयल की कूक
बाँसुरी की धुन।

तुम्हारा प्यार,
हमेशा मौन
पर बयां हो जाता,
जब भी तुमने चुप्पी साधी
और खामोशी को लिया थाम।

मेरा प्रेम,
अंतरात्मा को छूता
एक दर्द भरी दास्तां,
कभी भावुक कविता
अश्क़ भरे नयन, होठों पर मुस्कान।

तुम्हारा प्यार,
बिंदास हँसना

इशारों में भी बातें न करना।
गुमसुम बादलों की तरह,
अचानक घनघोर बरसना॥