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हस्ताक्षर नहीं, पहचान चाहिए

बबिता कुमावत
सीकर (राजस्थान)
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स्त्रियों की ज़िंदगी पर
पुरुषों के हस्ताक्षर बहुत हुए,
कभी पिता के नाम से
कभी पति के नाम से,
कभी किसी रिश्ते की मोहर से
उनके अस्तित्व के पन्ने भर दिए गए।

हर कदम पर कहा गया
“तुम कम हो, तुम कमज़ोर हो,”
तुम्हारे सपनों की उड़ान पर
सवालों के पत्थर रख दिए गए।

उसकी ख़ामोशी को सहमति समझा,
उसकी सहनशीलता को मजबूरी
और उसके आँसुओं को,
उसकी हार की कहानी लिख दिया गया।

पर स्त्री कोई खाली कागज़ नहीं,
जिस पर कोई भी अपनी सोच लिख दे
वह तो स्वयं एक किताब है,
जिसके हर पन्ने में संघर्ष भी है
और हर शब्द में अग्नि भी।

अब वक़्त बदल रहा है,
वह अपने नाम की स्याही से
अपनी तक़दीर लिख रही है।
क्योंकि स्त्रियों की ज़िंदगी में
किसी और के हस्ताक्षर नहीं,
उनकी अपनी पहचान होनी चाहिए॥