ऊर्जा पा लें

संजय सिंह ‘चन्दन’धनबाद (झारखंड )******************************** सूरज किरण बिखेरती, काटे कुहरा धुंध,लालिमा को देखते, खुल गई आँखें मूंददिखता लाल आकाश, पेड़-पौधे सब काले,सागर लाल, नदियाँ लाल प्रातः दृश्य निराले।तीखी किरणें, हमें जगाएं, बिस्तर से निकाले,शरद ऋतु में सूरज की तपिश से ऊर्जा पा लें,हड्डी की मजबूती को विटामिन ‘डी’ हम पा लें,हितकारी, गुणकारी सूर्य देव का … Read more

मिलें प्रभु जी कभी

हीरा सिंह चाहिल ‘बिल्ले’बिलासपुर (छत्तीसगढ़)********************************************* रचना शिल्प: १२२२-१२२२-१२२२-१२२२ मिलें प्रभु जी कभी दर्शन, सजेगा भी तभी जीवन।दिखें सबको विधाता तो, खिलेंगे साँस में उपवन॥ मिला करते विधाता पर, नहीं पहचान होती है,सजा रखते धरा के कण, यही परवान चढ़ती है।जगत के एक नारायण, वही हैं देवता सबके,हजारों रुप हैं उनके, मिलें दर्शन नहीं जिनके।न बाॅंटो … Read more

चलो जाने दो यारों

हरिहर सिंह चौहानइन्दौर (मध्यप्रदेश )************************************ कुछ भी हो जाए,तुम साथ मेरा मत छोड़नालोगों का क्या! वह तो कहते हैं,तुम यह सब छोड़ो, चलो जाने भी दो यारों। रखो हाथों में हाथ,मिलाकर हम दोनों साथनिकल रहे बेपरवाह होकर,तुम लोगों की चिंता मत करोचलो जाने भी दो यारों। प्यार के इस आसमान में,उड़ते फिरें हम दोनोंमंजिल मिलेगी … Read more

मिथ्या रिश्ते-नाते

डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’बेंगलुरु (कर्नाटक) ************************************************* मिथ्या सब रिश्ते-नाते ये, कलियुग में सब स्वार्थ सधा हैकहाँ आज अनुराग आपसी, मृगतृष्णा परमार्थ कहाँ है। झूठे वादों में भरमाए मधुर वचन प्रत्यक्ष दिखा हैअन्तर्मन छल राग द्वेष भय, अपनापन अब कहाँ बचा है। कहाँ दिखे भावों के रिश्ते, भागमभागी स्वार्थ बचा हैकहाँ कौन पहचाने रिश्ते, भौतिक दुनियाँ … Read more

प्रियतम

सरोजिनी चौधरीजबलपुर (मध्यप्रदेश)************************************** हो नहीं तुम पास प्रियतम,तुमको पाना चाहती हूँगीत जो तुमने सुनाए,गुनगुनाना चाहती हूँ। मानता यह दिल नहीं,इसको कहाँ ले जाऊँ मैंहर समय चितवन में हो,फिर भी बुलाना चाहती हूँ। तुमने तो वादा किया था,साथ दोगे तुम सदाक्यों भला मँझधार छोड़ा,जानना यह चाहती हूँ। कटेगा जीवन अकेला,यह खबर मुझको न थीआज फिर बीता … Read more

स्वयं की पहचान

डॉ. गायत्री शर्मा’प्रीत’इन्दौर (मध्यप्रदेश )******************************************* आसमान में भानु उदित हो जाये तब,सुबह की लालिमा-सी भोर लगती हूँ मैंगोधूलि की बेला में श्याम सुहानी हो,पँछियों की लौटने की आहट लगती हूँ मैं। तरुवर से घिरे गहन जंगल बीच,मधुर सुहानी बयार लगती हुई मैंशाम सुहानी आई चाँद आया तारों बीच,चाँद-तारों से खिली चाँदनी लगती हूँ मैं। मन … Read more

हम रहें एक…

हरिहर सिंह चौहानइन्दौर (मध्यप्रदेश )************************************ सनातन संस्कृति की धर्म ध्वजा,लेकर चल रहे हैं हम हिन्दूहमारी एकजुटता बनी रहे,हरदम हम रहें सब एक…। भेदभाव व जात-पात से रहें हम दूर,हिन्दूओं का आपसी भाईचारा बना रहेक्योंकि एकता भगवा की पहचान है,इसलिए हम रहें सब एक…। हिन्दू धर्म हमारा कभी नहीं सिखाता नफरत,इसलिए कमजोर नहीं हो हमारा स्वाभिमानयह … Read more

हाँ, शिक्षक हूँ…

हेमराज ठाकुरमंडी (हिमाचल प्रदेश)***************************************** बुझ चुके चिरागों को फिर से,जलाने की मुझमें ही तो क्षमता हैमैं एक शिक्षक हूँ, मुझमें पिता का प्यार,और ममत्व भरी माँ की ममता है। इन्हें कहने दो मुझे जो कहना है,शिक्षा का सूरज मुझसे ही चमका हैवह झुग्गियों का चिराग भी आज,मेरी निरन्तर सीखों से ही तो दमका है। मैंने … Read more

कहाँ दिखे परवेदना ?

डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’बेंगलुरु (कर्नाटक) ************************************************* कहाँ दिखे परवेदना, दीन दु:खी उदास।कहाँ दर्द संवेदना, अपनों पर विश्वास॥ मेरे मुकद्दर असफल, कहाँ मंजिलें छाँव।क्षत विक्षत निज ध्येय पथ, पा अपनापन घाव॥ अपने बेगाने हुए, पा सत्ता सुख भोग।टुटे रक्त बन्धन सकल, आपस योगायोग॥ अपने बेगाने हुए, लालच में पड़ आज।तनिक सफलता क्या मिली, चढ़ी प्रथम सर … Read more

वर्जित अभिव्यक्ति

रश्मि लहरलखनऊ (उत्तर प्रदेश)************************************************** मौन…,सिन्दूरी उत्पीड़न सेअनुभूतियाॅं कराह उठींस्त्री के सपनों केविच्छेदन पर,तर्क तिलमिलाए। इच्छाओं के विखंडन से,ज़िद्दी होती गई उनकीवैचारिक दृढ़तानहीं छीन पाए वे,उनकी जुझारूक्षमताओं को। चिंतित हुए सुनकर,उनकीअट्टहासित गर्जनाओं कोवे चल पड़ीं दुरूह पथ परनंगे पाॅंव!,ठुकराते हुए अपनों कीछलावे भरीलुभावनी छाॅंव। गठबंधन हो गया,भावों के क्षणिक उद्वेलन सेउनकी कर्मठ कल्पनाओं का,सुनो..उनमें हिम्मत हैबेहिसाब।वे … Read more