चाँद को जलाते हो
सलिल सरोज नौलागढ़ (बिहार) ******************************************************************** शाम ढले तुम छत पे क्यूँ आते हो, मुझे मालूम है चाँद को जलाते हो। तुमसे ही नहीं रौशन ये जहाँ सारा, मुस्कुराकर तुम उसे यह बताते हो। होंगे सितारे तुम्हारे हुस्न पर लट्टू, गिरा के दुपट्टा ये गुमाँ भी भुलाते हो। हुई पुरानी तुम्हारी अदाओं की तारीफें, रोककर सबकी … Read more