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दलित मसीहा एवं क्रांतिकारी महामानव

ललित गर्ग
दिल्ली

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डॉ. भीमराव आम्बेडकर जयन्ती विशेष


दुुनिया-जहान और विशेषतः भारत की परिस्थितियों को एक संतुलित,भेदभावरहित एवं समतामूलक समाज की निगाह से देखने एवं दलित जाति के साथ जुड़े सामाजिक और आर्थिक भेदभावों को समाप्त करने के लम्बे संघर्ष के लिए पहचाने जाने वाले डॉ. भीमराव आम्बेडकर इसी अप्रैल महीने में जन्मे थे। मानव जाति के इतिहास में कभी कोई ऐसा युग नहीं गुजरा,जब किसी ने अपने तर्क,कर्म एवं बुद्धि के बल पर तत्कालीन रूढ़िवादी मान्यताओं,जातिय भेदभाव एवं ऊंच-नीच की धारणाओं पर कड़ा प्रहार न किया हो। मनुष्य सदैव सत्य की तलाश में निरन्तर प्रयासरत रहा है और ऐसे ही समस्त जातिगत भेदभाव एवं असामनता पर प्रहार करने एवं उनको नेतृत्व देने के लिए डाॅ. आम्बेडकर को याद करना एक आदर्श एवं संतुलित समाज निर्माण के संकल्प को बल देना है।
बाबा साहेब के नाम से दुनियाभर में लोकप्रिय डॉ. आम्बेडकर समाज सुधारक,दलित राजनेता, महामनीषी,क्रांतिकारी योद्धा,लोकनायक,विद्वान, दार्शनिक,वैज्ञानिक,समाजसेवी एवं धैर्यवान व्यक्तित्व होने के साथ ही विश्व स्तर के विधिवेत्ता व भारतीय संविधान के मुख्य शिल्पकार थे। डॉ. आम्बेडकर विलक्षण एवं अद्वितीय प्रतिभा के धनी थे,उनके व्यक्तित्व में स्मरण शक्ति की प्रखरता, बुद्धिमत्ता,ईमानदारी,सच्चाई,नियमितता,दृढ़ता, प्रचंड संग्रामी स्वभाव का मणिकांचन मेल था। वे अनन्य कोटि के नेता थे,जिन्होंने अपना समस्त जीवन समग्र भारत की कल्याण-कामना,संतुलित समाज रचना में उत्सर्ग कर दिया। खासकर भारत के अस्सी प्रतिशत दलित सामाजिक व आर्थिक तौर से अभिशप्त थे, उन्हें इस अभिशाप से मुक्ति दिलाना ही डॉ. आम्बेडकर का जीवन संकल्प था। वे भारतीय राजनीति की एक धुरी की तरह थे, जो आज दुनियाभर के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण दलित मसीहा एवं संतुलित समाज संरचना के प्रेरक महामानव हैं।
भीमराव आम्बेडकर का जन्म १४ अप्रैल १८९१ को मध्यप्रदेश के महू में एक गरीब अस्पृश्य परिवार में हुआ था। भीमराव आम्बेडकर रामजी मालोजी सकपाल और भीमाबाई की १४वीं सन्तान थे। उनकी जाति के साथ सामाजिक और आर्थिक रूप से गहरा भेदभाव किया जाता था। संघर्ष एवं कष्टों की आग में तपकर उन्होंने न केवल स्वयं का विकास किया,वरन भारत के समग्र विकास का वातावरण निर्मित किया। उनके क्रियाकलापों में किंचित मात्र भी स्वार्थ नहीं था। बहु-भाषाविद्,धर्म दर्शन के विद्वान और समाज सुधारक बाबा साहेब ने भारत में अस्पृश्यता और सामाजिक असमानता के उन्मूलन के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया।
भारत के लोग कभी इतने भयंकर दौर से नहीं गुजरे,जैसे वे स्वतंत्रता संग्राम के समय गुजरे। ऐसे दौर में डाॅ. आम्बेडकर एक रोशनी बन कर प्रकट हुए। उनके नेतृत्व में धन सम्पन्न एवं ऊंची जाति के लोगों द्वारा बड़ी क्रूरता से अपने पैरों तले रौंदा हुआ दलित एवं मजदूर वर्ग समूचे भारत में संगठित होकर एक बड़ी शक्ति के रूप में उभरा। वह चाहते थे कि अछूत लोग नए कौशल प्राप्त करें और एक नया व्यवसाय शुरू करें,तथा औद्योगीकरण का लाभ उठाने के लिए शहरों की ओर रुख करें। वह चाहते थे कि अछूत खुद को राजनीतिक रूप से संगठित करें। राजनीतिक शक्ति के साथ अछूत अपनी रक्षा,सुरक्षा और मुक्ति संबंधी नीतियों को पेश करने में सक्षम होंगे। डॉ. आम्बेडकर ने छुआछूत के खिलाफ एक व्यापक आंदोलन शुरू करने का फैसला किया। उन्होंने सार्वजनिक आन्दोलनों और जुलूसों द्वारा पेयजल के सार्वजनिक संसाधन समाज के सभी लोगों के लिए खुलवाने के साथ ही अछूतों को भी हिंदू मंदिरों में प्रवेश करने का अधिकार दिलाने के लिए संघर्ष किया। उनका मानना था कि समाजवाद के बिना दलित-मेहनती इंसानों की आर्थिक मुक्ति संभव नहीं।
उन्होंने अमेरिका में कोलंबिया विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान,समाजशास्त्र,मानव विज्ञान,दर्शन और अर्थनीति का गहन अध्ययन किया। डॉ. आंबेडकर ने अमेरिका में एक में ‘भारतीय जाति विभाजन’ पर अपना मशहूर शोध-पत्र पढ़ा,जिसमें उनके व्यक्तित्व की सर्वत्र प्रशंसा हुई। उनका मानना था कि सामाजिक न्याय के लक्ष्य को प्राप्त करने के बाद ही आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों को हल किया जाना चाहिए। यह विचार कि,आर्थिक प्रगति सामाजिक न्याय को जन्म देगी,यह जातिवाद के रूप में हिंदुओं की मानसिक गुलामी की अभिव्यक्ति है। इसलिए सामाजिक सुधार के लिए जातिवाद को समाप्त करना आवश्यक है।
डाॅ. आम्बेडकर ने अपनी आर्थिक जरूरतों के लिए जीवन के आरम्भिक भाग में वे अर्थशास्त्र के प्राध्यापक रहे एवं वकालत भी की। उनके भीतर अंगड़ाई ले रहे राष्ट्रीय व्यक्तित्व ने उन्हें राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय कर दिया और तब आम्बेडकर भारत की स्वतन्त्रता के लिए प्रचार और चर्चाओं में शामिल हो गए। उन्होंने पत्र-पत्रिकाओं को न केवल प्रकाशित किया,वरन् उनमें क्रांतिकारी लेखनी से समाज को झकझोरा,राजनीतिक अधिकारों और दलितों के लिए सामाजिक स्वतंत्रता की वकालत और भारत के निर्माण में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।
डाॅ. आम्बेडकर धार्मिक विचारों के व्यक्तित्व थे। उन्होंने अपनी पुस्तक ‘जाति के विनाश’ भी प्रकाशित की,जो उनके न्यूयॉर्क में लिखे एक शोध-पत्र पर आधारित थी। इस लोकप्रिय पुस्तक में आम्बेडकर ने हिंदू धार्मिक नेताओं और जाति व्यवस्था की जोरदार आलोचना की थी। उन्होंने अस्पृश्य समुदाय के लोगों को गांधीजी द्वारा रचित शब्द हरिजन पुकारने के कांग्रेस के फैसले की भी कड़ी निंदा की थी। वे सच्चे अर्थों में एक महान क्रांतिकारी युगपुरुष थे,जिनके जीवन का सार है कि क्रांति लोगों के लिए होती है,न कि लोग क्रांति के लिए होते हैं।
जब भारत की स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस के नेतृत्व वाली नई सरकार बनी तो उसमें डाॅ. आम्बेडकर को देश का पहला कानून मंत्री नियुक्त किया गया। डॉ. आम्बेडकर को स्वतंत्र भारत के नए संविधान की रचना के लिए बनी संविधान मसौदा समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। डॉ. आम्बेडकर ने मसौदा तैयार करने के काम में सभी की प्रशंसा अर्जित की। बाबासाहेब आम्बेडकर के परिप्रेक्ष्य में संवैधानिक नैतिकता का अर्थ विभिन्न लोगों के परस्पर विरोधी हितों और प्रशासनिक सहयोग के बीच प्रभावी समन्वय करना था। उनके अनुसार भारत को जहाँ समाज में जाति,धर्म,भाषा और अन्य कारकों के आधार पर विभाजित किया गया है,एक सामान्य नैतिक विस्तार की आवश्यकता है तथा संविधान उस विस्तार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। उन्हें भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से मरणोपरांत सम्मानित किया गया था।

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