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हार नहीं मानते

प्रिया देवांगन ‘प्रियू’
पंडरिया (छत्तीसगढ़)
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मजदूर हैं हम देश के,मेहनत करना जानते हैं,
पसीना अपना बहाते हैं,कभी हार नहीं मानते हैं।

एक-एक ईंट जोड़कर,महलों को बनाते हैं,
दिनभर की मजदूरी करके,रोजी-रोटी कमाते हैं।

एक-एक पैसा जोड़-जोड़ कर,बच्चों को पढ़ाते हैं,
नहीं थकते हैं कभी भी हम,मेहनत खूब करते हैं।

कुटिया में रह कर भी,अपना सपना पूरा करते हैं,
खुद भूखे रहकर भी,बच्चों को खाना खिलाते हैं।

कभी पत्थर काटते तो कभी ईंट उठाते हैं,
अपनी मेहनत से हम,दूसरों के घर को सजाते हैं।

मजदूर हैं हम देश के,मेहनत करना जानते हैं।
पसीना अपना बहाते हैं,कभी हार नहीं मानते हैं॥

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