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मानवतावादी सतनाम धर्म के प्रबल पक्षधर रहे गुरु घासीदास

गोपाल चन्द्र मुखर्जी
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
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१८ दिसम्बर जन्म विशेष………….
विश्व के रचनाकर्ता सर्वजीव में प्राणदाता निरंतर विराजमान निराकार सर्वशक्तिमान परम ब्रह्म ही परम सत्य है। एक निराकार शक्ति! उनका नाम ही `सतनाम!` एक ही परमेश्वर को साधन तप द्वारा साधक व सत्य दृष्टाओं ने एक भाव से भिन्न-भिन्न पथ को अवलम्बन करते हुए मानव कल्याण में अपने विचार व उपदेश को देते हुए परम सत्य का प्रचार करते हुए एक-एक धर्म को सृजित किया है। उक्त सब ही गुरु या मार्गदर्शक परमपूजनीय का एक ही उद्देश्य रहा,वह है-मानव कल्याण। जीव में प्रेमभाव को जागृत कर अमन-चैन का संस्थापन। लक्षणीय यह है कि,दुनिया के सभी धर्मगुरुओं का एक ही मत है `परम ब्रह्म` ही सत्य है,लेकिन निराकार है। सर्वप्राण में निरन्तर विराजमान है। सिर्फ़ आस्थाओं को साधारण मनुष्यओं में स्थिर रखने के लिए एक-एक अलग मतानुयायी चिह्न का संस्थापन किया गया है। यह किसी भी धर्म में देखा जाता है। पुरातन काल में आदि शंकराचार्य जी ने परम ब्रह्म को निराकार एवं सत्य मानते हुए सर्वप्राणियों में परमेश्वर को सम अधिष्ठान व विराजित मानते हुए जगत में सर्व मनुष्य के समानाधिकार को स्वीकृत कर अद्वैत्ववाद का प्रचार किया,ताकि विश्व में वर्णाश्रम का सृजन न होकर मानव समाज में एक-दूसरे के प्रति प्रेम जागृत हो सके,विश्व में अमन-चैन का वतावरण बन सके। सनातन धर्म के अनुसार निराकार परमब्रह्म के प्रतीक स्वरुप शालीग्राम शिला का पूजन का विधान दिया गया है। प्रस्थर खण्ड को शिव जी के रुप से पूजन करने का विधान या सिर्फ `ॐ` चिन्ह को पूजन के विधान में मान्य किया गया है। जैसे,यहूदियों ने `अग्नि` को परमेश्वर का प्रतीक मानकर धर्माचरण किया है। जैन मुनियों ने भी कहा है कि ईश्वर निराकार है,ईश्वरीय शक्ति ही सत्य है,अहिंसा,प्रेम ही धर्म है। सिख धर्मगुरु नानकजी का भी यही एकमत `गुरुग्रन्थ` का ही पूजन स्वीकृत है। सन्त शिरोमणि गुरु घासीदास जी ने `सतनाम पन्थ` या `सतनामी समाज` की प्रतिष्ठा कर वही सन्देश विश्व को दिया हैl परमेश्वर का नाम ही सत्य हैl सृष्टि,सकल जीव-जन्तु,प्राणी सबमें परमेश्वर का या सत्य का ही अधिष्ठान है,वही सत्य है। कभी झुकना है तो सिर्फ़ परमेश्वर या सत्य के सामने ही झुकना है। सकल मनुष्य एक है,जग में सबका समान अधिकार है। सर्वजीव में उदार प्रेम,सबमें आत्मीय समदर्शन,अमन-चैन-शान्ति, भ्रातृत्व बोध ही सत्य है। `जैत स्तम्भ` मजबूत अटूट सत्य का ही प्रतीक है `जय सतनाम।` अनुरूप परवर्ती काल में ठाकुर परमहंस श्री रामकृष्ण देव जी ने भी भी वही कहा-`शिव ज्ञान से जीव सेवा`,`जितना मत उतने ही पथ`, `मानव में उदार प्रेम।` विश्व में सभी गुरुओं का उद्देश्य एक,जीव में प्रेम करते हुए आत्मीय समदर्शन या सह अवस्थान। विश्व में वैषम्यमुक्त समाज व अमन-चैन व परम शान्ति का संस्थापन करना ही धर्म का सही उद्देश्य है। सनातन धर्म को ही पुनः संस्थापन या संरक्षण करना है।
आदि अनंतकाल से वेद-वेदान्त,गीता,पुराण-कुरान,बाईबल,गुरुग्रन्थ साहिब जैसा कोई भी धर्मग्रन्थ दुनिया में अधिष्ठित है,तो उन सबका मूल शिक्षा या मतों के अनुसार कहीं भी प्राणियों में श्रेणी विभाजित करते हुए वर्णाश्रम का दृष्टान्त नहीं है। सभी धर्म ने विश्व में अखण्ड अमन-चैन के साथ मानव चेतना को उन्नत कर समाज को सहावस्थान के साथ सर्व प्राणियों में समदर्शन के साथ दया,क्षमा,शोषणमुक्त सामाजिक व्यवस्था करते हुए हर स्तर के मनुष्य का उच्च मानविक मूल्यायन कर कौमी एकता के साथ जीवन यापन करने की शिक्षा ही दी है। सिर्फ़ कालान्तर में स्वार्थान्वेषी शोषक या शासक श्रेणियों ने समाज में ऊंच-नीच,जात-पात की रीत-नीत को प्रचलित कर मानविक चेतना तथा मानव जात को कलंकित करते हुए सनातन धरम के मूल सिद्धांतों को विकृत कर सनातन धर्म को खण्डित एवं अपमानित ही किया है,जिसके परिणाम से आज विश्व में आतंकवाद,अराजकता,हिंसा,प्रतिशोध लेने का दौर जारी है। टुकड़ों में विभाजित होकर सनातन धर्म आज विकृत रूप में परिवर्तित हुआ हैl
आज उच्च वर्ग जिसको अछूत मानते हैं,उन्हीं के द्वारा धोए हुए कपड़े पहनकर शुद्ध होकर ईष्ट देव का पूजन करते हैंl यह कौन-सा न्याय है ? कौन-सा विशुद्ध धर्म है ? ऐसी सामाजिक विषमता या सनातन धर्म में गंभीर संकट के समय मानवतावादी,मानवप्रेमी,उदारपंथी साधक के अवतरण से विश्व को मिला सतनाम जैसा महामन्त्र। `सतनाम` या सतनामी पंथ के प्रवर्तक गुरु घासीदास जी छत्तीसगढ़ के रायपुर जिले के ग्राम गिरौद्पुरी में एक गरीब दलित परिवार में १८ दिसम्बर १७५६ को अवतरित हुए थे। पिताश्री का नाम महंगुदास व माताश्री का नाम अमरौतिन था। गुरु घासीदास जी के पूर्वज भी सतनाम धर्म के ही अनुयायी थे। विशुद्ध चित्त से परमेश्वर का नाम या सतनाम के स्मरण में है महावीर की ताकतl सतनाम धर्म का मूलमन्त्र या मतानुसार `परमेश्वर के अलावा किसी भी मनुष्य के सामने झुकना नहीं है,लेकिन सबका सम्मान करना जरुरी है,प्रेम देना है,अहिंसा व शान्ति से जीवन यापन करना है।` ऐसे मानवतावादी सतनाम धर्म को गुरु घासीदास जी के पूर्वज रहे बीरभान एवं जोगीदास नामक दो भाई ने सन १६७२ में ग्रहण करते हुए हरियाणा के नारनौल में सतनाम धर्म का प्रचार करने लगे थे।
गुरु घासीदास जी के पूर्वज हरियाणा से आकर महानदी के तट रायपुर में बस गए। गुरु घासीदास जी ने सतनाम धर्म को साध्य करते हुए सत्य की ख़ोज के लिए गिरौधपुरी में सोनाखान के गभीर जंगल में छाता पहाड़ पर समाधि लगाकर दीर्घ समय तपस्या की एवं गिरौधपुरी में ही अपना आश्रम बनवाया। जगत संसार के लिए गुरु घासीदास जी ने शिक्षा दी है,जैसे-`मूर्ति पूजा वर्जित है। जग संसार में प्रत्येक व्याक्ति का सामाजिक रुप से समान समान अधिकार है। उच्च वर्ग के प्रभुत्व से कई वर्णों में बाँटने वाली समाज व्यावस्था का विरोध। सबको प्रेम करें,पशुओं को भी।` उन्होंने मनुष्यों को बताया है कि सतनाम पर विश्वास रखो,जीव हत्या,मांसाहार,चोरी,जुआ जैसे कर्म से दूर रहना। महान मानवतावादी मानवप्रेमी सत्याश्रयी सतनाम पंथी संत गुरु घासीदास बाबा जी को पुन: प्रणाम।

परिचय-गोपाल चन्द्र मुखर्जी का बसेरा जिला -बिलासपुर (छत्तीसगढ़)में है। आपका जन्म २ जून १९५४ को कोलकाता में हुआ है। स्थाई रुप से छत्तीसगढ़ में ही निवासरत श्री मुखर्जी को बंगला,हिंदी एवं अंग्रेजी भाषा का ज्ञान है। पूर्णतः शिक्षित गोपाल जी का कार्यक्षेत्र-नागरिकों के हित में विभिन्न मुद्दों पर समाजसेवा है,जबकि सामाजिक गतिविधि के अन्तर्गत सामाजिक उन्नयन में सक्रियता हैं। लेखन विधा आलेख व कविता है। प्राप्त सम्मान-पुरस्कार में साहित्य के क्षेत्र में ‘साहित्य श्री’ सम्मान,सेरा (श्रेष्ठ) साहित्यिक सम्मान,जातीय कवि परिषद(ढाका) से २ बार सेरा सम्मान प्राप्त हुआ है। इसके अलावा देश-विदेश की विभिन्न संस्थाओं से प्रशस्ति-पत्र एवं सम्मान और छग शासन से २०१६ में गणतंत्र दिवस पर उत्कृष्ट समाज सेवा मूलक कार्यों के लिए प्रशस्ति-पत्र एवं सम्मान मिला है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-समाज और भविष्य की पीढ़ी को देश की उन विभूतियों से अवगत कराना है,जिन्होंने देश या समाज के लिए कीर्ति प्राप्त की है। मुंशी प्रेमचंद को पसंदीदा हिन्दी लेखक और उत्साह को ही प्रेरणापुंज मानने वाले श्री मुखर्जी के देश व हिंदी भाषा के प्रति विचार-“हिंदी भाषा एक बेहद सहजबोध,सरल एवं सर्वजन प्रिय भाषा है। अंग्रेज शासन के पूर्व से ही बंगाल में भी हिंदी भाषा का आदर है। सम्पूर्ण देश में अधिक बोलने एवं समझने वाली भाषा हिंदी है, जिसे सम्मान और अधिक प्रचारित करना सबकी जिम्मेवारी है।” आपका जीवन लक्ष्य-सामाजिक उन्नयन है।