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मैंने तुम्हें पहचान लिया है

इला कुमार
गाजियाबाद (उत्तरप्रदेश)
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काव्य संग्रह हम और तुम से


मर्यादा की गहरी लकीरों के बीच जब,
बड़े परिवार की छोटी लड़की किशोर वय से आगे बढ़ती है,
उलझी हुई उम्र की उन वीथियों में
प्रेम आया मेरे करीब।
बादाम के खुले पत्तों की सतह पर ठहरी चमक जैसा,
होली की रंगीन शाम में खुली छत के विस्तार पर
ठिठकी चंद्रकिरणों जैसा।
इंजन के रेडिएटर में भरे गर्म पानी के दबाव तले थमी हुई,
मंडराहट जैसा मंडराता हुआ।
मैंने आँख भर देखा भी नहीं,
प्रेम की तरफ
दबे पाँव हल्की मुस्कराहट में लिपटा हुआ फिर आया वह,
ससुराल की सीमेंटी मुंडेर पर फिसलता हुआ अल्लसुबह।
सबों के जागने से पहले,
मैंने नकार दिया
संयुक्त परिवार के शालीन संयमित आचारों के तहत।
उम्र के दरवाजे खुलते रहे,
रोशनी की मानिंद वयस उनके बीच से सरकती रही।
कई बार देखा मैंने,
खिड़की के बाहर खड़े पेड़-पौधे
किसी किसी ऋतु में,
अनजाने प्रहर के किन्हीं निमिषों में
अचानक उल्लसित हो उठते थे
डेहलिया की सुर्ख पंखुड़ियों से लेकर,
कॉसमॉस की सुनहरी सतह तक उज्वल हो उठती थी।
प्रेम उन पंखुड़ियों को छूता-सहलाता,
मेरे इंतजार में घास की नोंक से लेकर
अर्जुन के मोटे तने और,
फुनगियों तक लहरें भरता रहता था।
नीम की काली तिरछी डाल पर पंडुक पुरुष
अपनी प्रिया को लुभाता,
गर्दन डुला-डुला
नृत्य की भंगिमा में पूरी सुबह,
पूरी शाम डोलता रहता था।
गौरेयों के जोड़े में काली गर्दन वाले,
नर की उद्वेलित फुरकनें हवा को
तरंगायित करती रहती थीं।
मेरे पास कई काम होते थे,
बच्चों को ब्रश कराने से लेकर
स्कूल भेजने तक की जिम्मेदारी,
मैंने प्रेम की धड़कनों को पुष्पों,वृक्षों
चिडि़यों के संग पहचानना भी चाहा ही नहीं।
वक्त हारा,
लेकिन वह न हारा।
दुमंजिले प्रासाद की बालकनी से,
तीस फुट नीचे चिकनी
सड़क तक मेंह की लंबी,
लकीरों में घुला हुआ वह वर्षों
बरसता रहा,
इसे इंतजार था…
इंतजार था उसे कि एक दिन,
उम्र के किसी भी मोड़ पर मैं
पहचान लूंगी उसे।
सामने पसरे लॉन की विस्तृत
हरी नर्म सतह की तरह,
कतार में खडे यूकेलिप्टस के नुकीलेपन की तरह
पहचान लूंगी उसे मैं।
विंडो बॉक्स में खिले
गहरे लाल लिली पुष्पों की तरह,
क्यारियों में थरथराते पेरिविंकल की तरह
आओ,
अब मैंने तुम्हें वाकई पहचान लिया है।
तुम यहां मेरे वजूद के हर हिस्से में रहो,
रोमावलियों के हर छिद्र में सुकुन की तरह समा जाओ
अब तुम कहीं जाना नहीं,
लुकना-छिपना नहीं
मेरी पलकों की ओट में ठहरे पनीली पर्त की तरह,
तुम आजन्म
सात जन्मों तक मेरे संग रहो।
प्रेम,
मैंने तुम्हें पहचान लिया है॥

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