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कोयल कूके

बोधन राम निषाद ‘राज’ 
कबीरधाम (छत्तीसगढ़)
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कोयल कूके जब अमुवा पर,
मन भौंरा इठलाता है।
पिया मिलन की मधुरिम बेला,
राग प्रीत के गाता है॥

अमराई की सुन्दर छाया,
जहाँ खेल हमने खेला।
रंग बसन्ती पुरवाई में,
खुशियों का लगता मेला॥
वही सुहाना मौसम अब है,
याद बहुत अब आता है।
कोयल कूके जब अमुवा पर…।

हरी भरी खेतों की क्यारी,
मस्त हवाओं के झोंके।
मन मेरा स्वच्छंद विचरता,
कौन किसे कोई रोके॥
आसमान पर उड़ता पंछी,
मेरे मन को भाता है।
कोयल कूके जब अमुवा पर…।

सरसों की पीली चूनर से,
धरती दुल्हन-सी लागे।
मोर पपिहरा गीत सुनाते,
भाग्य सभी के हैं जागे॥
जाग उठा नीले अम्बर से,
सूरज भी मुस्काता है।
कोयल कूके जब अमुवा पर…।