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प्रकृति माँ,मानव है संतान

डॉ.एन.के. सेठी
बांदीकुई (राजस्थान)

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प्रकृति और मानव स्पर्धा विशेष……..


प्रकृति माँ,मानव है संतान।
करें हम स्वच्छता आह्वान॥
रहें हम सदा प्रकृति के संग।
सभी हम हैं कुदरत के अंग॥

प्रकृति का करें सभी सम्मान।
प्रकृति है मानव की पहचान॥
प्रकृति है ईश्वर का प्रतिरूप।
प्रकृति होती है छाया धूप॥

प्रकृति करती हमको आगाह।
करे मानव उसकी परवाह॥
प्रकृति देती हमको आशीष।
मनुज का झुक जाता है शीश॥

होय जब पुरुष प्रकृति का योग।
सृष्टि का बन जाता संयोग॥
प्रकृति है इस जग काआधार।
प्रकृति ही मुक्त करे संसार॥

प्रकृति के गुण होते हैं तीन।
सत्त्वरजतम इसके आधीन॥
सृष्टि है पूर्ण प्रकृति का खेल।
रहे हर मनुज प्रकृति का मेल॥

मनुज कर देता जब अन्याय।
प्रकृति भी कर देती है न्याय॥
प्रकृति भी करे मनुज को प्यार।
भूल पर मुस्काती हर बार॥

मनुज चलता है उलटी चाल।
प्रकृति कर देती है बेहाल॥
रहें हम सदा प्रकृतिअनुकूल।
चलें ना इसके हम प्रतिकूल॥

वृक्ष पर्वत सरिता उद्यान।
सभी है अंश प्रकृति की शान॥
प्रकृति का सुंदर है हर रूप।
प्रकृति भी है यथार्थ चिद्रूप॥

प्रकृति देती हमको निःस्वार्थ।
मनुज का होता उसमे स्वार्थ॥
मनुज का कुदरत सेअलगाव।
इसी से रोग पसारे पाँव॥

करें ना कभी प्रकृति से छेड़।
लगाओ खूब धरा पर पेड़॥
करें हम सभी प्रकृति से प्यार।
यही है सर्व जगत का सार॥

परिचय-पेशे से अर्द्ध सरकारी महाविद्यालय में प्राचार्य (बांदीकुई,दौसा)डॉ.एन.के. सेठी का बांदीकुई में ही स्थाई निवास है। १९७३ में १५ जुलाई को बांदीकुई (राजस्थान) में जन्मे डॉ.सेठी की शैक्षिक योग्यता एम.ए.(संस्कृत,हिंदी),एम.फिल.,पीएच-डी., साहित्याचार्य,शिक्षा शास्त्री और बीजेएमसी है। शोध निदेशक डॉ.सेठी लगभग ५० राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों में विभिन्न विषयों पर शोध-पत्र वाचन कर चुके हैं,तो कई शोध पत्रों का अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रकाशन हुआ है। पाठ्यक्रमों पर आधारित लगभग १५ व्याख्यात्मक पुस्तक प्रकाशित हैं। कविताएं विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। आपका साहित्यिक उपनाम ‘नवनीत’ है। हिंदी और संस्कृत भाषा का ज्ञान रखने वाले राजस्थानवासी डॉ. सेठी सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत कई सामाजिक संगठनों से जुड़ाव रखे हुए हैं। इनकी लेखन विधा-कविता,गीत तथा आलेख है। आपकी विशेष उपलब्धि-राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों में शोध-पत्र का वाचन है। लेखनी का उद्देश्य-स्वान्तः सुखाय है। मुंशी प्रेमचंद पसंदीदा हिन्दी लेखक हैं तो प्रेरणा पुंज-स्वामी विवेकानंद जी हैं। देश और हिंदी भाषा के प्रति आपके विचार-
‘गर्व हमें है अपने ऊपर,
हम हिन्द के वासी हैं।
जाति धर्म चाहे कोई हो 
हम सब हिंदी भाषी हैं॥’

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