रचना पर कुल आगंतुक :114

न खून बहे,न कोई `जातिवाद` का पाप सहे..

दीपेश पालीवाल ‘गूगल’ 
उदयपुर (राजस्थान)
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वो निम्न कुल की लड़की थी,
मैं स्वर्ण जात का लड़का था।
वो जय भीम की करती थी,
मैं इंकलाब को गाता था।
वो देख मुझे यूँ मुस्कुराती थी,
मैं उसको देखकर हँसता था…l
वो निम्न कुल…

हौले-हौले फिर प्यार हुआ,धीरे से इजहार हुआ,
जाति अलग थी दोनों की,झटपट से इंकार हुआl
मैंने बातें सब उसे समझा दी थी,
मुहब्बत बड़ी है जात से,यह बात बता दी थी।
वो नासमझ-सी लड़की थी,
मैं उसको समझाया करता था…।
वो निम्न कुल…

जब बात हुई थी शादी की,
जात बीच में आ गई थीl
फिर माँ आई थी उसकी,
और ऊंच-नीच समझा गई थी।
मुहब्बत चढ़ती भेंट जातिवाद की,
मुझको यह स्वीकार न थाl
फिर रचा ली शादी हमने,
हम पर किसी का अधिकार न थाl
लोग उठाते थे प्रश्न मुहब्बत पर,
मैं सबको प्रेम सिखाया करता था…।
वो निम्न की…

फिर हो गई शादी,हुई शुरू नई कहानी थी,
अभी थे नादां हम,अभी नई जवानी थी।
फिर हुए महीने नौ,खुशखबरी प्यारी आई थी,
इतने में खुशियों की खबर किसी ने जात को हमारे सुनाई थीl
आनी थी खुशियां द्वार हमारे,
मैं मिठाई मंदिर-मन्दिर बांटा करता था…।
वो निम्न कुल…

फिर आए कुछ लोग निम्न कुल के,तो कुछ ऊँची जात के भी बन्दे थे,
हाथ तलवार,लाठी और बंदूक लिए इरादे उनके गंदे थे।
फिर पकड़ा उसको उसके अपनों ने,पेट पे पहला वार किया,
पेट मैं पल रही नन्हीं गुड़िया का उसके मामा ने संहार किया।
फिर पकड़ा दोनों को भरे बाजार तलवार हम पर चलाई थी,
देख करतूत जातिवाद की,मेरी मासूम मुहब्बत शरमाई थी।
मैं अंतिम भी क्षण में भी,
मुहब्बत जिन्दाबाद ही गाता था…l
वो निम्न कुल…

अब कहता हूँ सब बातें सुन लो,
इश्क़ कहीं न रुक जाएl
इस `जातिवाद` के आगे यह मुहब्बत कहीं न रुक जाए,
न सड़कों पर किसी का खून न बहेl
और न ही कोई `जातिवाद` का पाप सहे,
सब रहें चैन और अमन से,मुहब्बत जिन्दाबाद रहेl
बात इतनी-सी मैं सबको समझाया करता था…,
वो निम्न कुल…की लड़की थीll

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