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कवियों के कवि जनकवि ‘नागार्जुन’

डॉ. दयानंद तिवारी
मुम्बई (महाराष्ट्र)
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जनकवि नागार्जुन का असली नाम वैद्यनाथ मिश्र था,परंतु हिन्दी साहित्य में उन्होंने ‘नागार्जुन’ तथा मैथिली में ‘यात्री’ उपनाम से रचनाएँ कीं। काशी में रहते हुए उन्होंने ‘वैदेह’ उपनाम से भी कुछ कविता लिखी थीं। सन् १९३६ में सिंहल में ‘विद्यालंकार परिवेण’ में उन्होंने ‘नागार्जुन’ नाम ग्रहण किया। आरंभ में उनकी हिन्दी कविताएँ भी ‘यात्री’ के नाम से ही छपी थीं। वस्तुतः कुछ मित्रों के आग्रह पर १९४१ के बाद उन्होंने सिर्फ ‘नागार्जुन’ ही लिखा। यही उनके जीवन और बाद का नाम है। कविता में विभिन्न प्रयोगों के कवि नागार्जुन को ‘आधुनिक कबीर’ कहा जाता है। उनकी कविताओं से काव्य को जो दिशा और पहचान मिली,उसे नागार्जुन की नागार्जुन काव्य शैली के अंतर्गत ही रखा जा सकता है।
समकालीन साहित्य आन्दोलन के प्रखर वक्ता उदय प्रकाश ने कहा कि,’यह जोर देकर कहने की ज़रूरत है कि बाबा नागार्जुन बीसवीं सदी की हिंदी कविता के सिर्फ ‘भदेस’ और मात्र विद्रोही मिजाज के कवि ही नहीं,वे हिंदी जाति के सबसे अद्वितीय मौलिक बौद्धिक कवि थे। वे सिर्फ ‘एजिट पोएट’ नहीं, पारम्परिक भारतीय काव्य परम्परा के विरल ‘अभिजात’ और ‘एलीट पोएट’ भी थे।’ उदय प्रकाश ने बाबा नागार्जुन के व्यक्तित्व-निर्माण एवं कृतित्व की व्यापक महत्ता को एक साथ संकेतित करते हुए एक ही महावाक्य में लिखा है कि,’खुद ही विचार करिये,जिस कवि ने बौद्ध दर्शन और मार्क्सवाद का गहन अध्ययन किया हो, राहुल सांकृत्यायन और आनंद कौसल्यायन जैसी प्रचंड मेधाओं का साथी रहा हो,जिसने प्राचीन भारतीय चिंतन परम्परा का ज्ञान पालि,प्राकृत,अपभ्रंश और संस्कृत जैसी भाषाओं में महारत हासिल प्राप्त किया हो,जिस कवि ने हिंदी,मैथिली,बंगला और संस्कृत में लगभग एक जैसा वाग्वैदग्ध्य अर्जित किया हो,अपनी मूल प्रज्ञा और संज्ञान में जो तुलसी और कबीर की महान संत परम्परा के निकटस्थ हो,जिस रचनाकार ने ‘बलचनमा’ और ‘वरुण के बेटे’ जैसे उपन्यासों के द्वारा हिंदी में आंचलिक उपन्यास लेखन की नींव रखी हो,जिसके चलते हिंदी कथा साहित्य को ‘रेणु’ जैसी ऐतिहासिक प्रतिभा प्राप्त हुई हो,जिस कवि ने अपने आक्रांत निजी जीवन ही नहीं, बल्कि अपने समूचे दिक् और काल की,राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों और व्यक्तित्व पर अपनी निर्भ्रांत कलम चलाई हो,बीसवीं सदी के आधुनिक राजनीतिक व्यक्तित्व (लेनिन) पर समूचा खण्डकाव्य रच डाला हो,जिसके हैंडलूम के सस्ते झोले में मेघदूतम् और ‘एकाॅनमिक पाॅलिटिकल वीकली’ एकसाथ रखे मिलते हों,जिसकी अंग्रेजी भी किसी समकालीन हिंदी कवि या आलोचक से बेहतर ही रही हो,जिसने रजनी पाम दत्त,नेहरू,बर्तोल्त ब्रेख्ट,निराला,लूशुन से लेकर विनोबा,मोरारजी,जेपी,लोहिया,केन्याता, एलिजाबेथ,आइजन हावर आदि पर स्मरणीय और अत्यंत लोकप्रिय कविताएं लिखी हों,…बीसवीं सदी की हिंदी कविता का प्रतिनिधि बौद्धिक कवि वह है…।’
इसमें संदेह नहीं है कि नागार्जुन की हर कविता के गर्भ में एक व्यथित ऐतिहासिक घटना होती है, जिसे नागार्जुन बिना किसी लाग-लपेट के कह देने में कोई गुरेज नहीं करते। वे लिखते हैं कि-
‘कई दिनों तक चूल्हा रोया,चक्की रही उदास, कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उसके पास,
कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त,
कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त,
दाने आये घर के है भीतर कई दिनों के बाद, धुआँ उठा आँगन के ऊपर कई दिनों के बाद, चमक उठी घर भर की आँखें कई दिनों के बाद,
कौए ने खुजलाई पाँखें कई दिनों के बाद।’
यह नागार्जुन की एक प्रसिद्ध कविता ‘अकाल और उसके बाद’ की पंक्तियां हैं। ये पंक्तियां उनकी कविता की लोकप्रियता और कलात्मक सौंदर्य के मणिकांचन संयोग के एक उल्लेखनीय और अनुपम उदाहरण के रूप में जानी जाती है।
नागार्जुन की कविताओं में संवेदना के विविध नए आयाम स्थापित हुए हैं। नागार्जुन के काव्य की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि उनकी कविता स्थान विशेष की कविता न होकर पूरे देश की है,जबकि नागार्जुन मूलतः मैथिली भाषी है। मैथिली की अपनी कविताओं पर वे साहित्य अकादमी के पुरस्कार से सम्मानित भी हुए हैं।
नागार्जुन के रचना-विधान का एक अनिवार्य तत्व है व्यंग्य,जो उन्हें मुक्तिबोध और शमशेर या अज्ञेय जैसे कवियों से भिन्न करता है। केवल कथ्य के कारण नहीं,नागार्जुन अनेक छंदों का भी उपयोग करते हैं। इतने सारे काव्य-रूप निराला के बाद बहुत कम कवियों ने अपनाए हैं। उनका गहन अध्ययन और विश्लेषण करते हुए नागार्जुन-काव्य के शिल्प को समझा जा सकता है। नागार्जुन ने भूले-बिसरे काव्य-रूपों को तो अपनाया ही,उन्होंने नए छंदों की भी रचना की। कई बार एक ही कविता में कई काव्य-रूपों को अपनाया।
शमशेर बहादुर सिंह कहते हैं,-‘नागार्जुन के यहाँ काव्य रूपों की अद्भुत विविधता है, उनके जितने कथ्य उतने रूप। इसलिए नागार्जुन की प्रत्येक कविता का रचना-विधान अलग होता है।’
‘प्रेत का बयान’ नागार्जुन की सबसे चर्चित कविता है। एक प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक को माध्यम बनाकर उन्होंने इस कविता की रचना की है,जिसमें तत्कालीन समाज की नक्श का पूरा लेखा-जोखा चित्रित है।
‘ओ रे प्रेत-
कडककर बोले नरक के मालिक यमराज
-सच-सच बतला!
कैसे मरा तू ?
भूख से,अकाल से ?
बुखार कालाजार से ?
पेचिस बदहजमी,प्लेग महामारी से ?
कैसे मरा तू,सच-सच बतला!’

पेशा से प्राइमरी स्कूल का मास्टर था
-“किन्तु भूख या क्षुधा नाम हो जिसका
ऐसी किसी व्याधि का पता नहीं हमको
सावधान महाराज,
नाम नहीं लीजिएगा
हमारे समक्ष फिर कभी भूख का !!’
सुनकर दहाड़
स्वाधीन भारतीय प्राइमरी स्कूल के
भुखमरे स्वाभिमानी सुशिक्षक प्रेत की
रह गए निरूत्तर
महामहिम नर्केश्वर।

बाबा नागार्जुन को भाव-बोध और कविता के मिज़ाज के स्तर पर सबसे अधिक निराला और कबीर के साथ जोड़कर देखा जाता है। वैसे,यदि जरा और व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो नागार्जुन के काव्य में अब तक की पूरी भारतीय काव्य-परम्परा ही जीवंत रूप में उपस्थित है। उनका कवि-व्यक्तित्व कालिदास और विद्यापति जैसे कई कालजयी कवियों के रचना-संसार के गहन अवगाहन,बौद्ध एवं मार्क्सवाद जैसे बहुजनोन्मुख दर्शन के व्यावहारिक अनुगमन तथा सबसे बढ़ कर अपने समय और परिवेश की समस्याओं,चिन्ताओं एवं संघर्षों से प्रत्यक्ष जुड़ाव तथा लोक-संस्कृति एवं लोकहृदय की गहरी पहचान से निर्मित हुआ है। उनका ‘यात्रीपन’ भारतीय मानस एवं विषय-वस्तु को समग्र और सच्चे रूप में समझने का साधन रहा है।
उनका गतिशील,सक्रिय और प्रतिबद्ध सुदीर्घ जीवन उनके काव्य में जीवंत रूप से प्रतिध्वनित-प्रतिबिंबित है। सही अर्थों में भारतीय मिट्टी से बने आधुनिकतम कवि और सुगढ़ काव्य मनीषी हैं बाबा नागार्जुन।
उनका काव्य युद्ध तत्कालीन सच को सच लिखना है,बस! बेबाक रुप से!
बाबा नागार्जुन ने जब साहित्य की भाव भूमि पर लिखना शुरू किया,तब आधुनिक काल में, छायावाद के बाद अत्यंत सशक्त साहित्यांदोलन प्रगतिवाद ही था। प्रगतिवाद का मूल आधार सामाजिक यथार्थवाद रहा है। प्रगतिवादी काव्य वह है,जो अतीत की संपूर्ण व्यवस्थाओं के प्रति रोष व्यक्त करता है और उसके बदलाव की आवाज़ को बुलंद करता है।
नागार्जुन के काव्य में प्रगति के स्वर सर्वप्रमुख हैं। नागार्जुन ने मार्क्सवाद को नहीं अपनाया,बल्कि युगीन और आंतरिक जरूरत के मुताबिक आंतरिक अनिवार्यता की जड़े उनके परिवारिक परिवेश में थीं इसलिए उन्होंने अपनी कविता के माध्यम से मार्क्सवादी,सिद्धांतों का प्रचार किया है। उनकी कविता में अमीर-गरीब,मालिक-मजदूर,जमींदार-कृषक,उच्चवर्ग-निम्नवर्ग के बीच द्वंद दिखाई देता है। गरीबी,भुखमरी,बीमारी,अकाल,बाढ़ जैसे सामाजिक यथार्थ का सूक्ष्म चित्रण उनकी कविताओं का प्राण तत्व है।
प्रगतिशील हिंदी कविता में सबसे अधिक संवेदनशील और लोकोन्मुख जनकवि नागार्जुन की विशिष्टता इसी बात में रही है कि उनकी रचनाओं और उनके वास्तविक जीवन में गहरा सामंजस्य है। नागार्जुन बुनियादी तौर पर देहाती जीवन के राष्ट्रीय विचारधारा के कवि हैं,उनके कविता संसार का बड़ा भाग गाँव के अनुभवों से निर्मित हुआ है। उनकी कविताएँ सामाजिक,आर्थिक,राजनीतिक आदि पक्षों में एक बड़ा चिन्ह हमारे समक्ष प्रस्तुत करती है।
नागार्जुन ने अपने युगीन यथार्थ और समसामयिक चेतना को अपनी कविता से मुखरित किया है, जिसमें एक ओर तो गरीब किसान,मजदूर शोषण के अनवरत चक्र में पिसते हए दाने-दाने को मोहताज हैं,तो दूसरी ओर नकाबधारी जो भोग-विलास में लिप्त लोग हैं-
‘जमींदार है,साहूकार हैं,
बनिया है,व्यापारी हैं।
अन्दर-अन्दर विकट कसाई,
बाहर खद्दरधारी हैं।’
बाबा नागार्जुन गरीबों के पक्षधर थे वे लिखते हैं कि-
गुलाबी धोती सीप की बटनोंवाला रेशमी कुर्ता मलमल की दुपलिया फूलदार टोपी/ नेवले की मुंह सी मूठ की नफीस छड़ी बड़ा और छोटा सरकार /लालासहेब,हीराजी/ मालिक जी, मोती साहेब, बच्चन जी / नून की बचोल बाचू / हवेली से निकले बनकर संवर कर।’

महाकवि उनका मध्यमवर्गीय जीवन तथा मजदूर वर्ग की जिन्दगी का संपूर्ण चित्र यथार्थ रूप में मिलता है। उन्होंने जगत की वास्तविकता को सामने लाया। उन्होंने अपने साहित्य के माध्यम से एक नयी समस्या एक नयी चेतना का अलोक दिखाया। नागार्जुन की कविता में शोषित और पीड़ितों के प्रति गहरी सहानुभूति है कुली और मजदूर को देखकर कवि को इसका बड़ा करूणिक दृश्य खुरदरे पैर कविता में मिलता है,वे जीवन के भयंकर यथार्थ का चित्रण करते हैं,उन्होंने पूंजीवाद, साम्राज्यवाद,संप्रदायवाद सभी का विरोध किया है, जिससे श्रमिक,शोषित वर्ग और किसानों को उनके श्रम का उचित मान मिल सके।
वे एक जनकवि के रूप में खुद को जनता के प्रति जवाबदेह समझते हैं,किसी राजनीतिक दल के प्रति नहीं। इसलिए जब वे साफ ढंग से सच कहते हैं,तो कई बार वामपंथी दलों के राजनीतिक और साहित्यिक नेताओं को भी नाराज करते हैं।
जो लोग राजनीति और साहित्य में सुविधा के सहारे जीते हैं,वे दुविधा की भाषा बोलते हैं। नागार्जुन की दृष्टि में कोई दुविधा नहीं है। वे अपने पूरे जीवन में खतरनाक सच साफ बोलने का खतरा निर्भिक होकर उठाते रहे।
‘प्रतिबद्ध हूँ’ कविता में उन्होंने दो टूक लहजे में अपनी दृष्टि को स्पष्ट कर दिया है-वे कहते हैं-
‘प्रतिबद्ध हूँ,
जी हाँ,प्रतिबद्ध हूँ-
बहुजन समाज की अनुपल प्रगति के निमित्त-
संकुचित ‘स्व’ की आपाधापी के निषेधार्थ
अविवेकी भीड़ की ‘भेड़िया-धसान’ के खिलाफ
अंध-बधिर ‘व्यक्तियों’ को सही राह बतलाने के लिए
अपने आपको भी
‘व्यामोह’ से बारंबार
उबारने की खातिर प्रतिबद्ध हूँ,
जी हाँ,शतधा प्रतिबद्ध हूँ!’
नागार्जुन का संपूर्ण काव्य-संसार इस बात का प्रमाण है कि उनकी यह प्रतिबद्धता हमेशा स्थिर और अक्षुण्ण रही,उनके समय में छायावाद, प्रगतिवाद,हालावाद,प्रयोगवाद,नई कविता, अकविता,जनवादी कविता और नवगीत आदि जैसे कई काव्य-आंदोलन चले और उनमें से ज्यादातर कुछ काल तक सरगर्मी दिखाने के बाद चलते बने,पर बाबा की कविता इनमें से किसी ‘चौखटे’ में अँट कर नहीं रही,बल्कि हर ‘चौखटे’ को तोड़कर आगे का रास्ता दिखाती रही। उनके काव्य के केन्द्र में कोई ‘वाद’ नहीं रहा,बजाय इसके वह हमेशा अपने काव्य-सरोकार ‘जन’ से ग्रहण करते रहे। उन्होंने किसी बँधी-बँधाई पंक्ति का निर्वाह नहीं किया,बल्कि अपने काव्य के लिए स्वयं की पंक्ति का निर्माण किया। इसीलिए बदलते हुए भाव-बोध के बदलते धरातल के साथ नागार्जुन को सात दशकों अर्थात् ७० वर्षों की अपनी काव्य-यात्रा के दौरान अपनी कविता का बुनियादी भाव-धरातल बदलने की जरूरत महसूस नहीं हुई। ‘पछाड़ दिया मेरे आस्तिक ने’ जैसी कविता में ‘बाबा का काव्यात्मक डेविएशन’ भी सामान्य जनोचित है और असल में,वही उस कविता के विशिष्ट सौंदर्य का आधार भी है।
उनकी कविता कोई बात घुमाकर नहीं कहती,बल्कि सीधे-सहज ढंग से कह जाती है। उनके अलावा,आधुनिक हिन्दी साहित्य में इस तरह की विशेषता केवल गद्य-विधा के दो शीर्षस्थ लेखकों,आजादी से पूर्व के दौर में प्रेमचन्द और आजादी के बाद के दौर में हरिशंकर परसाई में रेखांकित की जा सकती है।
उनका काव्य-संघर्ष उनके जीवन-संघर्ष से तदाकार है और दोनों के बीच किसी ‘अबूझ-सी पहेली’ का पर्दा नहीं लटका है। मुक्तिबोध की कविताओं के विचार-धरातल की तरह। उनका संघर्ष अंतर्द्वंद्व, कसमसाहट और अनिश्चितता भरा संघर्ष नहीं है, बल्कि खुले मैदान का,निर्द्वन्द्व,आर-पार का खुला संघर्ष है और इस संघर्ष के समूचे घटनाक्रम को बाबा मानो अपनी डायरी की तरह अपनी कविताओं में दर्ज करते गए हैं। हालाँकि, उनकी कविताओं की ‘तात्कालिकता’ के कारण उसे कई तथाकथित साहित्यकारों ने अखबारी कविता कहकर खारिज करने की कोशिशें की हैं।
यह निर्विवाद है कि,कबीर के बाद हिन्दी कविता में नागार्जुन से बड़ा सार्थक साहित्यिक व्यंग्यकार अभी तक कोई और नहीं हुआ। नागार्जुन के काव्य में व्यक्तियों के इतने व्यंग्यचित्र हैं कि उनका एक विशाल अलबम तैयार किया जा सकता है।
दरअसल,आज भी नागार्जुन की कविताओं को अख़बारी कविता कहने वाले शायद यह समझ ही नहीं पाते कि उनकी तात्कालिकता में ही उनके कालजयी होने का राज छिपा हुआ है,और वह राज यह है कि तात्कालिकता को ही उन कविताओं में रचनात्मकता का सबसे बड़ा हथियार बनाया गया है। उनकी कई प्रसिद्ध कविताएँ जैसे कि ‘इंदुजी, इंदुजी क्या हुआ आपको’,‘आओ रानी,हम ढोएंगे पालकी’,’अब तो बंद करो हे देवी यह चुनाव का प्रहसन’ और ‘तीन दिन,तीन रात’ आदि इसका बेहतरीन प्रमाण हैं।
असल में साहित्यिक पृष्ठिभूमि की बात यह है कि,नागार्जुन की कविताएं आम पाठकों के लिए सहज है,मगर विद्वान आलोचकों के लिए उलझन में डालने वाली हैं। ये कविताएँ जिनको संबोधित हैं,उनको तो झट से समझ में आ जाती हैं,पर कविता के स्वनिर्मित प्रतिमानों से लैस पूर्वग्रही आलोचकों को वह कविता ही नहीं लगती या उनके समझ में ही नहीं आती। ऐसे आलोचक उनकी कविताओं को अपनी सुविधा के लिए तात्कालिक राजनीति संबंधी,प्रकृति संबंधी और सौंदर्य-बोध संबंधी आदि जैसे कई खाँचों में बाँट देते हैं और उनमें से कुछ को स्वीकार करके बाकी को खारिज कर देना चाहते हैं। वे उनकी सभी प्रकार की कविताओं की एक सर्वसामान्य भावभूमि की तलाश ही नहीं कर पाते, क्योंकि उनकी आँखों पर स्वनिर्मित प्रतिमानों से बने पूर्वग्रह की पट्टी बँधी होती है।
बाबा के लिए कवि-कर्म कोई आभिजात्य शौक नहीं,बल्कि ‘खेत में हल चलाने’ जैसा है। वह कविता को रोटी की तरह जीवन के लिए अनिवार्य मानते हैं। उनके लिए सर्जन और अर्जन में भेद नहीं है। इसलिए उनकी कविता राजनीति,प्रकृति और संस्कृति,तीनों को समान भाव से अपना उपजीव्य बनाती है। उनकी प्रेम और प्रकृति संबंधी कविताएँ उसी तरह भारतीय जनचेतना से जुड़ती हैं, जिस तरह से उनकी राजनीतिक कविताएँ। बाबा नागार्जुन कई अर्थों में एकसाथ सरल और बीहड़,दोनों तरह के कवि हैं। यह विलक्षणता भी कुछ हद तक निराला के अलावा बीसवीं सदी के शायद ही किसी अन्य हिन्दी कवि में मिलेगी! उनकी एक कविता ‘पैने दाँतोंवाली’ की ये पंक्तियाँ देखिए-
‘धूप में पसरकर लेटी है मोटी-तगड़ी,
अधेड़,मादा सुअर…
जमना-किनारे मखमली दूबों पर
पूस की गुनगुनी धूप में पसरकर लेटी है
वह भी तो मादरे हिंद की बेटी है
भरे-पूरे बारह थनोंवाली!’
यह बीहड़ता कई दूसरे कवियों में भी है,पर इतनी स्वाभाविक कहीं नहीं है। यह नागार्जुन के कवि-मानस ‘में ही संभव है,जहाँ सरलता और बीहड़ता, दोनों एक-दूसरे के इतने साथ-साथ उपस्थित हैं। इसी के साथ उनकी एक और विशेषता भी उल्लेखनीय है,जिसे डॉ. रामविलास शर्मा ने सही शब्दों में रेखांकित करते हुए कहा है कि,’नागार्जुन ने लोकप्रियता और कलात्मक सौंदर्य के संतुलन और सामंजस्य की समस्या को जितनी सफलता से हल किया है,उतनी सफलता से बहुत कम कवि-हिन्दी से भिन्न भाषाओं में भी हल कर पाए हैं।’
बाबा की कविताओं की लोकप्रियता का तो कहना ही क्या! बाबा उन विरले कवियों में से हैं जो एक साथ कवि-सम्मेलन के मंचों पर भी तालियाँ बटोरते रहे और गंभीर आलोचकों से भी समादृत होते रहे। बाबा के इस जादुई कमाल के बारे में खुद उन्हीं की जुबानी यह दिलचस्प उद्धरण सुनिए–
‘कवि-सम्मेलनों में बहुत जमते हैं हम। समझ गए ना ? बहुत विकट काम है कवि-सम्मेलन में कविता सुनाना। बड़े-बड़ों को,तुम्हारा,क्या कहते हैं,हूट कर दिया जाता है। हम कभी हूट नहीं हुए। हर तरह का माल रहता है,हमारे पास। यह नहीं जमेगा,वह जमेगा। काका-मामा सबकी छुट्टी कर देते हैं हम….। समझ गए ना ?’
इस तरह की बाबा की दर्जनों खूबसूरत कविताएँ हैं,जो इस दृष्टि से उनके समकालीन तमाम कवियों की कविताओं से विशिष्ट कही जा सकती हैं। लोकप्रिय कविताएँ ‘धूमिल’ की भी हैं पर उनमें कलात्मक सौंदर्य का वह स्तर नहीं है,जो नागार्जुन की कविताओं में है। बाबा की कविताओं में आखिर यह विलक्षण विशेषता आती कहाँ से है? दरअसल,बाबा की प्राय: सभी कविताएँ संवाद की कविताएँ हैं और यह संवाद भी एकहरा और सपाट नहीं है। वह हजार-हजार तरह से संवाद करते हैं अपनी कविताओं में। आज कविता के संदर्भ में संप्रेषण की जिस समस्या पर इतनी चिंता जताई जा रही है, वैसी कोई समस्या बाबा की कविताओं को व्यापती ही नहीं। सुप्रसिद्ध समकालीन कवि केदारनाथ सिंह स्पष्ट रूप से स्वीकार करते हैं कि,स्वाधीनता के बाद के कवियों में यह विशेषता केवल नागार्जुन के यहाँ दिखाई पड़ती है….यह बात दूसरे प्रगतिशील कवियों के संदर्भ में नहीं कही जा सकती।
बाबा की कविताओं की इसी विशेषता के एक अन्य कारण की चर्चा करते हुए केदारनाथ सिंह कहते हैं कि बाबा अपनी कविताओं में ‘बहुत से लोकप्रिय काव्य-रूपों को अपनाते हैं। वस्तुत: सांस्कृतिक संकट और मानवीय तत्व के गठन की जो बात बार बार साहित्य में उठाई जाती रही है उसे सही अर्थों में नागार्जुन ने अपनी कविताओं में उठाया है। वर्तमान युग में साहित्य निर्माण की ऐसी स्थितियां उत्पन्न हो चुकी हैं जिसमें अपनी नियति के इतिहास निर्माण के सूत्र मनुष्य के हाथों से छूटे हुए लगते हैं। बाबा नागार्जुन उन सूत्रों को अपनी कविताओं के माध्यम से बांधे रखने में सफ़लता प्राप्त की है। इसीलिए,निःसंदेह वे कवियों के कवि जनकवि हैं।