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विजय के गान हों…

डॉ.विद्यासागर कापड़ी ‘सागर’
पिथौरागढ़(उत्तराखण्ड)
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एकता का सूत्र हो,
तो विजय के गान हों।
फिर जगत में पूजनीय,
भारती की शान हो॥

एक मातु के हैं पूत,
चाहे कोई धर्म हो।
हित में भारती के ही,
अपने सारे कर्म हों॥
पथ प्रदर्शक थे सदा,
फिर हमारा मान हो।
एकता का सूत्र हो,
तो विजय के गान हों…॥

दिखे जो हानि देश की,
जागती हो वेदना।
नित सुप्तता का नाश हो,
चेतती हो चेतना॥
अपनी धरा रहे सदा
अपना आसमान हो।
एकता का सूत्र हो,
तो विजय के गान हों…॥

कोई माँगे हाथ तो,
सहायता करें सदा।
हम देश के लिये जियें,
कर्मरत हों सर्वदा॥
हमें पुकारता है विश्व,
उर में यही भान हो।
एकता का सूत्र हो,
तो विजय के गान हों…

हम बने रहें सदा सरल,
उर में गंग नीर हो।
जो भेदता हो लक्ष को,
सोच में वो तीर हो॥
नित मन में मानस रहे,
वेद रस का पान हो।
एकता का सूत्र हो,
तो विजय के गान हों…॥

फिर जगत में पूजनीय,
भारती की शान हो।
एकता का सूत्र हो,
तो विजय के गान हों…॥

परिचय-डॉ.विद्यासागर कापड़ी का सहित्यिक उपमान-सागर है। जन्म तारीख २४ अप्रैल १९६६ और जन्म स्थान-ग्राम सतगढ़ है। वर्तमान और स्थाई पता-जिला पिथौरागढ़ है। हिन्दी और अंग्रेजी भाषा का ज्ञान रखने वाले उत्तराखण्ड राज्य के वासी डॉ.कापड़ी की शिक्षा-स्नातक(पशु चिकित्सा विज्ञान)और कार्य क्षेत्र-पिथौरागढ़ (मुख्य पशु चिकित्साधिकारी)है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत पर्वतीय क्षेत्र से पलायन करते युवाओं को पशुपालन से जोड़ना और उत्तरांचल का उत्थान करना,पर्वतीय क्षेत्र की समस्याओं के समाधान तलाशना तथा वृक्षारोपण की ओर जागरूक करना है। आपकी लेखन विधा-गीत,दोहे है। काव्य संग्रह ‘शिलादूत‘ का विमोचन हो चुका है। सागर की लेखनी का उद्देश्य-मन के भाव से स्वयं लेखनी को स्फूर्त कर शब्द उकेरना है। आपके पसंदीदा हिन्दी लेखक-सुमित्रानन्दन पंत एवं महादेवी वर्मा तो प्रेरणा पुंज-जन्मदाता माँ श्रीमती भागीरथी देवी हैं। आपकी विशेषज्ञता-गीत एवं दोहा लेखन है।