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उम्मीदों का गणतंत्र और झांकियों तक फैलता सियासत का जहर…

अजय बोकिल
भोपाल(मध्यप्रदेश) 

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बीते साल की एक ‘उपलब्धि’ यह भी मान लें कि देश में सियासत का जहर अब झांकियों तक फैल गया है। इस बार २६ जनवरी की गणतंत्र दिवस परेड में ३ राज्यों की झांकियों को खारिज करने का मामला राजनीतिक रंग लेता जा रहा है। ये झांकियां किन कारणों से खारिज हुईं,यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं है, लेकिन जिन पश्चिम बंगाल,केरल और महाराष्ट्र की ये झांकियां खारिज हुईं,उन तीनों ने केन्द्र की मोदी सरकार पर ‘पूर्वाग्रह ग्रस्त’ होने का आरोप लगाया है। साथ ही उनकी झांकियों को चयन सूची से बाहर किए जाने को ‘तीनों राज्यों की जनता का अपमान’ और ‘राजनीतिक साजिश’ बताया है। वैसे झांकी बिहार की भी निरस्त हुई है,लेकिन उसने कोई कड़ी प्रतिक्रिया नहीं दी है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने झांकी खारिज करने को मोदी सरकार की ‘बदले की कार्रवाई’ बताते हुए कहा कि चूंकि हम बंगाल में `सीएए` और `एनआरसी` कानून लागू करने का विरोध कर रहे हैं,इसलिए हमारी झांकी को गणंतत्र दिवस परेड में शामिल होने से रोक दिया गया।

गणतंत्र दिवस पर भव्य रंगारंग परेड आजाद भारत की यूएसपी बन गया है। ये परेड भारत की सैनिक शक्ति,ऐतिहासिक वैभव,आर्थिक-सामा‍िजक प्रगति और सांस्कृतिक विविधता की चलती-फिरती मोहक तस्वीर पेश करती है। इसे पूरी दुनिया में देखा जाता है। देश की राजधानी नई दिल्ली में इस परेड की शुरूआत १९५० में हो गई थी,लेकिन इसे भव्य स्वरूप १९५५ में तब ‍मिला,जब यह परेड राजपथ पर शुरू हुई। इस परेड का आयोजन मुख्‍य रूप से रक्षा मंत्रालय के तत्वावधान में होता है,और तीनों सेनाओं के सुप्रीम कमांडर राष्ट्रपति इस रंगारंग परेड की सलामी लेते हैं। इस परेड में हर साल तीनो सेनाओं के करीब एक दर्जन सैनिक दस्ते,लगभग इतने ही अर्द्धसैनिक बलों के दस्ते,करीब २० सेना बैंड,विद्यालयीन बच्चों के दस्ते और एक दर्जन से अधिक विभिन्न राज्यों-केन्द्र शासित प्रदेशों तथा केन्द्र सरकार के विभागों की झांकियां शामिल होती हैं। झांकियों के लिए सम्बन्धित राज्यों को पत्र ६ माह पहले ही भेज दिया जाता है। राज्य अपनी झांकी के प्रस्ताव विशेषज्ञ समिति के पास भेजते हैं। झांकी का मापदंड बहुत स्पष्ट है। मसलन राज्यों की झांकी इतिहास के प्रेरक प्रसंगों,धार्मिक-सामाजिक उत्सवों, अनूठी वास्तुशिल्पीय और सांस्कृतिक विरासत,विकास की सामाजिक-आर्थिक योजनाएं, पर्यावरण,लोक नृत्य तथा ‍भविष्य के परिदृश्य की भूमिका पर केन्द्रित हो सकती है। प्रस्ताव मंजूर होने पर झांकी के अंतिम चयन के लिए मामला फिर विशेषज्ञ समिति के पास जाता है। अधिकृत जानकारी के अनुसार इस बार झांकियों के कु‍ल ५६ प्रस्ताव स्वीकृत हुए थे,उनमें से अंतिम चयन २२ राज्यों की झांकियों का हुआ,जिनमें बंगाल,महाराष्ट्र और केरल नदारद थे।

यह बहुत साफ है कि झांकियों को परेड में शामिल करने के कुछ निश्चित और कड़े मापदंड हैं। कई राज्य प्रस्ताव भेजते हैं,लेकिन अंतिम परेड में कुछ को ही मौका मिलता है। इस लिहाज से किसी राज्य की झांकी का परेड में शामिल होना या किया जाना, सम्बन्धित राज्य की प्रतिष्ठा से भी जुड़ा होता है,पर इसका अर्थ यह भी नहीं कि जिन राज्यों की झांकी खारिज हुई,उनकी कोई ‘झांकी’ नहीं बची। यह प्रक्रिया हर साल होती है,लेकिन झांकियों के चयन और अस्वीकार करने को लेकर न तो राजनीतिक बवाल मचा,और न ही नीयत पर सवाल उठे।

चूं‍कि,इस वक्त देश में भाजपा शासित केन्द्र सरकार और ज्यादातर गैर भाजपा शासित राज्यों के आपसी रिश्ते अपने निम्नतम स्तर पर हैं,इसलिए हर सामान्य प्रक्रिया में भी ‘साजिश’ सूंघना अस्वाभाविक नहीं है। इसका एक वाजिब कारण यह है ‍कि,तीनों राज्यों ने अपनी-अपनी झांकी के लिए जो भूमिका प्रस्तावित की थी,वह निर्धारित मापदंडों के अनुरूप थी। मसलन बंगाल की झांकी में राज्य सरकार की ऑटोमैटिक कैश ट्रांसफर स्कीम ‘कन्या श्री’ योजना तथा शालेय बच्चों के लिए साइकल देने की ‘सबुज साथी’ योजना को दर्शाया गया था। इसी प्रकार केरल की झांकी में राज्य की `थैयम` एवं `कमलमंडलम` कला व वास्तुशिल्प को बताया गया था,जबकि महाराष्ट्र की झांकी में मराठी थियेटर की डेढ़ सौ साल की समृद्ध परम्परा को दिखाया गया था। इसके बाद भी ये झांकियां खारिज हुईं तो कारण तकनीकी कम,राजनीतिक ज्यादा लगता है। हालांकि,ऐसा कोई ठोस प्रमाण नहीं है कि केन्द्र सरकार ने इन तीन राज्यों की झांकियों के चयन में भांजी मारी हो,लेकिन अस्वीकृति का भी कोई वाजिब कारण न बताने से शक के कैनवास को विस्तार मिला है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने साफ कहा कि राज्य की झांकी को ठुकराना मोदी सरकार द्वारा बंगाल के लोगों का अपमान करना है। केरल के कानून मंत्री के. बालन ने प्रति प्रश्न ‍किया कि क्या कभी ऐसी केन्द्र सरकार देखी है, जो देश के संघीय विचार के खिलाफ हो,जो मलयाली लोगों पर निशाना साधती हो और केरल के नाम से ही आवेश में आ जाती हो ? महाराष्ट्र में सत्तारूढ़ एनसीपी सांसद सुप्रिया सुले ने भी केन्द्र सरकार पर पूर्वाग्रह से ग्रस्त होने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र व बंगाल दोनों राज्यों ने देश के स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और ऐसे राज्यों की झांकियों को खारिज करना जनता के ‘अपमान’ जैसा है। हालांकि,मोदी सरकार के बचाव में महाराष्ट्र के भाजपा नेता मोहन भंडारी ने कहा कि, गणतंत्र दिवस परेड में सभी राज्यों को रोटेशन के आधार पर मौका दिया जा रहा है। बता दें कि, चयनित झांकियों वाले राज्यों में से ८ में भाजपा अथवा एनडीए शासित सरकारें हैं,४ में यूपीए शासित तथा ४ में गैर भाजपा सरकारें हैं। बाकी ६ केन्द्र सरकार के ‍विभागों की झांकियां हैं। कहते हैं `शक का इलाज तो हकीम लुकमान के पास भी नहीं है`,लेकिन शक की खरपतवार न उगने देने की जिम्मेदारी भी केन्द्र सरकार की है। यह पूरी तरह निराधार नहीं है कि झांकी अस्वीकृति के लिए जिस विशेषज्ञ समिति की आड़ ली जा रही है,उसे ‘ऊपर’ से कोई ‘इशारा’ हो। मोदी सरकार न चाहती हो कि तकरीबन पर मुद्दे पर उससे दो-दो हाथ कर रही ममता दी की कोई ‘उपलब्‍धि’ देश के सामने आए,या फिर वाम शासित केरल का लाल रंग के अलावा भी कोई सांस्कृतिक वैभव दिखे,अथवा महाराष्ट्र में भाजपा को ठेंगा दिखाकर विपक्षी दलों के हाथों सत्ता का मंगलसूत्र पहनने वाली शिवसेना किसी मराठा विरासत का सेहरा अपने ‍सर बांध ले। हालां‍कि,यह अनुमान ही है,लेकिन सचमुच ऐसा है तो जनता में यही संदेश जाएगा कि यह निहायत हल्की मानसिकता वाली मजबूत सरकार है। वैसे भी राज्यों की प्रगति अथवा सांस्कृतिक संपदा किसी एक दल या एक सरकार की बपौती नहीं है। अगर वह उपलब्‍धि है,तो पूरे राष्ट्र की है और प्रकारांतर से केन्द्र सरकार की भी है। इस बार झांकी चयन के पीछे मोदी सरकार की नीयत क्या रही है,कहना मुश्किल है,लेकिन जो संदेश जा रहा है,वह स्वस्थ नहीं है। मुमकिन है कि इन तीनों राज्यों की झांकियां वास्तव में मानदंडों से कमतर हों,लेकिन इसका कारण स्पष्ट किया जाता तो सम्बन्धित राज्यों को बवाल मचाने का मौका ही न मिलता। जंगल में बाघिन कई बार अपने बच्चों को ही खा जाती है, लेकिन हम जिस व्यवस्था में जी रहे हैं,वह जंगल नहीं है,जीवित लोकतंत्र है। इसमें कोई अपनी ‘राजनीतिक झांकी’ जमाने के ‍लिए दूसरे की ‘राजनीतिक झांकी’ पर चाकू चलाए तो यह तात्कालिक स्वार्थ सिद्धि के लिहाज से भले ठीक हो,‘देश की झांकी’ को विद्रूप करने वाला है।