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कुछ बोल न पाए

जसवीर सिंह ‘हलधर’
देहरादून( उत्तराखंड)
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सोना खेतों ने उगला जब,
ठीक तरह हम तोल न पाये।
माना बेईमान हुए वो,
हम भी तो कुछ बोल न पाये॥

खेती का वरदान मिला था,
हम धरती के वीर रथी थे।
साहूकारों की मंडी में,
छुपकर बैठे पतित पथी थे।
उनको मालिक मान लिया क्यों,
अपना खाता खोल न पाये।
हम भी तो कुछ बोल न पाये…॥

बहुत सरल होता है यारों,
महज हवा में किले बनाना।
लेकिन काम कठिन है भाई,
दानों की कीमत घर लाना।
आँखों आगे माल चुराया,
पग भर आगे डोल न पाये।
हम भी तो कुछ बोल न पाये…॥

अपनी बात सुनाते रहना,
चार जनों में ज्ञानी बनकर।
व्यापारी के संग कभी हम,
सौदा ना कर पाये तन कर।
रंग बदलते बाज़ारों में,
अपनी राह टटोल न पाये।
हम भी तो कुछ बोल न पाये…॥

संसद बैठे नेताओं ने,
खूब दिखाये स्वप्न उजाले।
उनके कोरे वादों से ना,
मिट पाये हाथों के छाले।
वादे पूरे ना होने पर,
चमड़ी उनकी छोल न पाये।
हम भी तो कुछ बोल न पाये…॥

सच है दौड़ नहीं पाये हम,
बाजारू आपा-धापी में।
मंडी में बैठे शातिर ने,
झोल किया नापा-नापी में।
जब वो लीन हुए इस मद में,
‘हलधर’ क्यों विष घोल न पाये।
हम भी तो कुछ बोल न पाये…॥