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उठो! नूतन प्रभात आई

आचार्य गोपाल जी ‘आजाद अकेला बरबीघा वाले’
शेखपुरा(बिहार)
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सूरज की किरणें आई हैं,
संग नई खुशियां लाई हैं
कली कुंज में मुस्काई है,
विहग वृंद मंगल गाई है
जग ने नवजीवन पाई है,
उठो! नूतन प्रभात आई है।

ठंडी-ठंडी हवा सुहानी,
चले चाल में ये मस्तानी
नई ताजगी-नई कहानी,
नया जोश है पाए प्राणी
प्रभात शुभ बेला लाई है।
उठो! नूतन प्रभात आई है…

त्यागो अपना आलस सारा,
सभी काम तब लगेगा प्यारा
देखो सुंदर है आया नजारा,
कर्तव्य पथ ने तुम्हें पुकारा,
अब तो हटा दो तन-से रजाई है।
उठो! नूतन प्रभात आई है…

सुबह सुहानी तेरी बन जाएगी,
लगन पेड़-पौधों से बढ़ जाएगी
प्रात: टहलना,हँसना-हँसाना,
ये आदत जो तेरी डल जाएगी।
ये सुंदर सुहाना समय भाई है,
उठो! नूतन प्रभात आई है॥